३४४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय किया जा रहा है उसका स्वयं निरीक्षण किया था। श्री पुजारी, जिन्होंने दीवान साहबके साथ रहकर उन्हें यह सारा कार्य दिखाया था, कहते हैं कि दीवानने कामकी प्रशंसा की और इस बातको महसूस किया कि चरखेसे किसानोंको सहायक धन्वा तो मिलता ही है, इसके अलावा उससे दलित वर्गोंका पर्याप्त उत्थान भी होता है । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १७-५-१९२८ ३८६. भारत के सम्बन्ध में सत्य : कुमारी मेयोको उत्तर नीचे दिया जा रहा लेख और इसी मालाके जो अन्य लेख यहाँ बादमें दिये जायेंगे, उन्हें इस पत्रमें छापते हुए मुझे खेद ही नहीं, निश्चय ही संकोच भी हो रहा है । मुझे लगता है कि कुमारी मेयोको जरूरत से ज्यादा जवाब दिये गये हैं, यदि मुझे यह विश्वास होता कि कुमारी मेयोकी इस निन्दापरक पुस्तकके पाठक, इस पुस्तकके खण्डनमें जो कुछ प्रकाशित हो चुका है और अभी हो रहा है, उसे पढ़ते हैं तो मुझे दीनबन्धु एण्ड्रयूजका उत्तर' प्रकाशित करनेमें कम संकोच होता । किन्तु मुझे आशंका है कि ये खण्डन कुमारी मेयोके पाठकों तक नहीं पहुँचते और इसलिए उनका महत्व बहुत कुछ कम हो जाता है। कुमारी मेयो एक दूषित सिद्धान्तका प्रतिनिधित्व करती हैं। कोई भी राष्ट्र समस्त संसारके लिए अभिशाप नहीं हो सकता। भारत निश्चय ही वैसा राष्ट्र नहीं है। किन्तु 'मदर इंडिया' की लेखिका जैसे लेखक संसारके लिए अभिशाप हैं । और मैं निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि केवल खण्डनात्मक लेख लिखकर उनका मुकाबला किया जा सकता है फिर चाहे वे लेख कितनी ही शुद्ध भावनासे और योग्यतापूर्वक क्यों न लिखे जायें। दूसरे शब्दोंमें कहूँ तो जो प्रश्न मुझे व्यथित कर रहा है वह यह है कि भाषण या लेखनमें क्या महज सचाई झूठका प्रतिकार कर सकती है। यदि कुमारी मेयोका दूषित प्रचार सफलतापूर्वक रोकना हो तो क्या कोई इससे सर्वथा भिन्न और अधिक उदात्त कार्य करना आवश्यक नहीं है ? किन्तु मेरे पास पहलेसे तैयार और प्रभावकारी ऐसा कोई विकल्प नहीं है, जो दीन- बन्धु एन्ड्रयूजके जैसे लेखोंकी जगह ले सके । और चूंकि 'यंग इंडिया' जिस सिद्धान्तका अभिव्यंजक है उसे हम दोनों एक साथ स्वीकार करते हैं और दोबारा विचार करनेपर भी उनका यही खयाल है कि उनके इस खण्डनकी अब भी उपयोगिता है, इसलिए मैं उन्हें रोक नहीं पा रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि यदि उनके इन लेखोंसे कुमारी मेयोके विकृत चित्रणमें विश्वास करनेवाले एक भी स्त्री या पुरुषका भ्रम-निवारण हो जाये तो इससे उनको और मुझे भी निश्चित रूपसे सन्तोष हो जायेगा । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १७-५-१९२८ १. सी० एफ० एण्ड यूजके ये लेख यहाँ नहीं दिये जा रहे हैं। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३७६
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