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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३७९

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प्राथमिक शिक्षा - २ ३४७ वहाँ शिक्षाका माध्यम अंग्रेजी है; हमें समझना चाहिए कि राष्ट्रीय शिक्षामें अंग्रेजी हरगिज माध्यम नहीं होगी । वहाँ बड़े खर्चीले मकान बनाकर शिक्षा दी जाती है। हम समझ लें कि यह उचित नहीं है। हमारी पाठशालाओंके मकान सादे और कम खर्चीले होंगे । वहाँ अक्षर ज्ञान और साहित्य पर ही जोर दिया जाता है और हिन्दुस्तान के उद्योगोंके प्रति लापरवाही चलती है। हम देखते हैं कि यह उचित नहीं है । वहाँ धर्मकी, यानी साम्प्रदायिक नहीं, बल्कि साधारण धर्मकी शिक्षाका त्याग किया जाता है। हम जानते हैं कि इस त्यागसे शिक्षा ही निर्मूल हो जाती है । सरकारी स्कूलोंमें जो इतिहास पढ़ाया जाता है, वह झूठा नहीं तो केवल अंग्रेजोंकी दृष्टिसे ही लिखा होता है। उन्हीं चीजोंका निरूपण जर्मन, फ्रेंच और अमेरिकी इतिहासकार दूसरी तरह करते हैं । हालकी घटनाओंको सरकारी लेखक एक तरहसे पेश करते हैं और जनताके आदमी दूसरी तरह करते हैं, जैसे पंजाबका हत्याकाण्ड | सरकारी स्कूलका अर्थ-शास्त्र अंग्रेजी पद्धतिका समर्थन करता है, जब कि हम उसे दूसरी ही दृष्टिसे देखते हैं । सरकारी स्कूल शहरी सभ्यताकी हिमायत करते हैं । राष्ट्रीय सभ्यताके प्राण गाँव हैं । सरकारी प्राथमिक स्कूलोंमें शिक्षक लोगोंका संस्कारवान् विद्वान होना जरूरी नहीं माना जाता और इसलिए उन्हें वेतन बहुत थोड़ा दिया जाता है; जब कि राष्ट्रीय प्राथमिक पाठशालाओंके शिक्षकोंको चारित्र्यवान्, ज्ञानी और त्यागी होनेके कारण (लाचार होनेके कारण नहीं) कमसे कम वेतन लेनेवाला होना चाहिए। इससे हमें इस बातका कुछ अनुमान हो जायेगा कि हमारे शहरी विद्यालयों में कैसी शिक्षा होनी चाहिये । हमारे विद्यार्थी गाँवोंमें जाकर गाँवोंकी सभ्यताको स्थिर बनानेवाले, उनकी जरूरतें जाननेवाले, उनमें जहाँ दोष हों उन्हें दूर करनेवाले, उनके बच्चोंको शहरी न बनकर देहाती बने रहनेकी या किसान बनानेकी शिक्षा देनेवाले होने चाहिए । इस तरह जबतक शहरोंमें दी जानेवाली हमारी शिक्षाका ढाँचा साहसके साथ जड़से ही नहीं सुधारा जाता, तबतक हम विद्यापीठके एक बड़े ध्येय तक नहीं पहुँच सकते, उसपर अमल नहीं कर सकते । एक ही उदाहरण लें : हम अहमदाबादमें ही महाविद्यालय, नई गुजराती पाठ- शाला और विनय-मन्दिर चलाते हैं । इन्हें चलानेका अधिकार हमें तभी हो सकता है, जब हम इन विद्यालयोंमें पढ़नेवाले बालकोंको देहाती बनानेकी कोशिश करें। उन्हें हम ग्रामजीवनमें रस लेनेवाले -- • उसे जाननेवाले बनायें, और आखिरमें उनमें से जो विनय मन्दिर या महाविद्यालय छोड़कर निकलें, वे गाँवोंमें फैल जायें और देहातियों- की सेवामें लग जायें । यह कैसे हो, इसका विचार बादमें करेंगे । [ गुजरातीसे ] नवजीवन, २० -५-१९२८ Gandhi Heritage Portal