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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३८०

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चि० मणि, ३९०. पत्र : मणिबहन पटेलको मौनवार [२१ मई, १९२८ ] चि० कान्तिको लिखे गये पत्रमें शारदा बहनके सम्बन्धमें तुम्हारी टिप्पणी मैंने पढ़ी। जरा खेद हुआ। मैं तो नित्य स्मरण करता हूँ। जो कोई वहाँसे आता है उससे पूछता हूँ । मीरा बनने तो बहुत कुछ कहा है। वह सब क्या लिखा जा सकता है ? परन्तु मैं आशा नहीं छोड़ बैठा हूँ। यह मानकर बैठा हूँ कि सब ठिकाने आ जायेंगे । लिखनेका उत्साह आये तब लिखना । वहाँके तुम्हारे कामसे वल्लभभाई सन्तुष्ट हैं, यह बम्बई में उन्होंने मुझे खुद बताया, यही सन्तोषकी बात हुई । यों मेरे लिए इतना काफी नहीं। मुझे तो गाम्भीर्य, शान्ति, सन्तोष, विवेक, मर्यादा, निश्चय, सूक्ष्म सत्यपरायणता, तीव्रता, अध्ययन, ध्यान आदि चाहिए। नहीं तो तुम्हारा जीवन कुमारी और सेविकाको शोभा देनेवाला नहीं बनेगा । बापूके आशीर्वाद [ गुजरातीसे ] बापुना पत्रो : मणिबहेन पटेलने प्रिय मित्र, ३९१. पत्र : जाकिर हुसैनको सत्याग्रह आश्रम साबरमती २३ मई, १९२८ आपका पत्र मिला, जिसकी नितान्त स्पष्टवादिताके लिए मैं बहुत कद्र करता हूँ । व्यक्तिगत रूपसे मैं भी प्रबल असहयोगकी घोषणाको ज्यादा पसन्द करता, परन्तु चूंकि आपकी घोषणामें काफी नरमी है मैं आपको संस्था छोड़नेकी सलाह देनेको तैयार नहीं हूँ । आखिरकार जब परीक्षाकी घड़ी आती है, घोषणाका उतना महत्व नहीं होता जितना कि कार्यका । संस्थाका भविष्य अन्ततः न्यासियों पर निर्भर नहीं होगा वरन् उसके प्राध्यापकों पर होगा, जो अपना सब कुछ उसे अर्पित कर रहे हैं । मैं आपकी आर्थिक कठिनाईको समझता हूँ। मैं असमर्थ हूँ । मैंने बम्बईमें डा० अन्सारीसे इस सम्बन्ध में बातचीत की थी और उन्होंने मुझे बताया कि वे बम्बईसे कुछ १. साधन-सूत्र के अनुसार । Gandhi Heritage Portal