पुण्यका सौदा ३५१ पुरुष समझे जाते हैं, तब सिर्फ लाटरी प्रथाको ही अलग चुनकर उसकी आलोचना करना कठिन है। सट्टेका बाजार अगर जुआ खेलना नहीं तो और क्या है ? और तो भी जुएके इस ज्वरसे कौन बचा हुआ है ? सट्टेके बाजारमें हाथ मार कर जो अपनेको एक ही दिनमें धनी होते हुए पाते हैं, उनमेंसे हर एक आदमी जानता है कि उसके घर में लक्ष्मीके एकाएक आनेके मानी हैं कितनी ही विधवाओंके घरोंका सत्यानाश हो जाना। उन विधवाओंके रिश्तेदारोंने भी बेशक उसी तरह्की आशा की होगी, जैसी कि हमारे कल्पनाके चतुर सट्टेबाजने की होगी । यह बात विचित्र भले ही जान पड़े, मगर दरअसल कपास, चावल और जूट पर ये सट्टे किये जाते हैं। लाटरीकी पद्धति भी जुए की उसी भावनाका मद्दा विस्तार है। इसमें कोई शक नहीं कि लाटरीको निरादरकी चीज मानना बहुत अच्छा है, मगर उससे भी अच्छा यह होगा कि सबसे बुरे लक्षणका निदान करनेकी अपेक्षा लाटरी और सट्टा बाजारके भीतर छिपी भावनाको पहचान कर इस रोगकी जड़ ही काट दी जाये। इसलिए आशा ही की जा सकती है कि सबसे बुरे लक्षणके ही जरिए हम रोगकी जड़ तक पहुँच कर उसका समुचित इलाज कर सकेंगे । मगर यह तो बहुत दूरकी ही आशा । एक आदमी भी लाटरीमें शामिल होनेका औचित्य यह कहकर साबित न करे कि मैंने यह रोग तो सर्वत्र फैला हुआ बताया है । जब कि यह लाटरी किसी परोपकारी संस्थाके सम्बन्धमें हो तो सावधानीकी और भी अधिक जरूरत है । योग्यता पैदा किये बिना धनी होने की इच्छा करना बेशक बुरा है, मगर परोपकारके साथ जुएका सम्बन्ध जोड़ना तो निश्चित रूपसे ही बुरा है। जो लोग लाटरीमें रुपये फेंकें, वे यह कभी न सोचें कि एक अनुचित आकांक्षाकी पूर्ति करनेकी आशा रखते हुए भी वे पुण्य कमायेंगे। हम दोनों काम एक ही साथ नहीं कर सकते कि परमात्माकी पूजा भी करें और अपने लिए अनुचित ढंगसे टके भी सीधे करें और गोआके अस्पतालोंके ईसाई संचालक, मनुष्योंकी बुरी प्रवृत्तिका अनुचित लाभ उठाकर धर्मको गढ़में क्यों डालते हैं ? क्या वे समझते हैं कि लाखों आदमियोंको नैतिक दृष्टिसे बीमार बना कर, अस्पताल चलाने की कोशिश करके वे परमात्माको प्रसन्न करते हैं ? क्या वे रामको देनेके लिए सोहनके घर डाका नहीं डालते ? इने- गिने लोगोंको रोगमुक्त करनेसे क्या लाभ होगा अगर वे साथ ही उससे हजार गुना अधिक आत्माओंको सन्ताप पहुँचाते हैं । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, २४-५-१९२८ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३८३
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