३९५. नगरपालिकाके स्कूलोंमें कताई जलगांव खादी बोर्डके मंत्रीने मेरे पास वहाँकी नगरपालिकाकी शालाओंमें चरखा और तकलीपर कताईके बारेमें एक मली-भाँति तैयार की हुई रिपोर्ट आँकड़ों सहित भेजी है । यह रिपोर्ट १५ जून, १९२७ से १५ फरवरी, १९२८ तककी है । १४९ लड़कियाँ और १२६ लड़के तकली या चरखेपर कातते रहे हैं। रोजाना २५ से ५० मिनट तक तकली या चरखा चलानेका समय दिया गया है। कुल ४,४८,००० गज सूत काता गया है । तकलीपर कताईकी रफ्तार अधिक से अधिक १२५ गज और चरखेपर ३२५ गज प्रति घंटा थी । यह काम तो प्रशंसाके योग्य है। जो बात जलगाँव नगरपालिका स्कूलोंमें सम्भव हो सकी है, वह सभी नगरपालिका स्कूलोंमें सम्भव है । यह सिद्ध किया जा सकता है कि अगर राष्ट्र चाहे तो पाठशालाओंमें पढ़नेवाले लड़के-लड़कियोंके जरिए ही अपनी जरूरतका सारा सूत कतवा सकता है, और साथ ही उन बच्चोंको स्वाभिमान और स्वावलम्बनका पाठ उनकी पढ़ाईके कालमें ही सिखा सकता है, जिसे कि कुछ लोग गलत ही गैरजिम्मेदारी और मजे उड़ानेका काल समझते हैं। मैंने यह भी गौर किया है कि केवल चरखा चलानेवाले लड़के अपनी रुई आप धुन लेते हैं । इसका अर्थ तो यह होता है कि तकली चलानेवाले रुई आप नहीं धुनते । यह बात दिनोंदिन अधिकाधिक महसूस की जा रही है कि अच्छी कताईका रहस्य महज अच्छी धुनाई नहीं, बल्कि बिलकुल निर्दोष धुनाई है। यह तभी हो सकता है, जब सब अपनी-अपनी रुई स्वयं धुन लें। अगर इसे सीखनेकी सच्ची कोशिश की जाय तो यह आसानी से सीखी जा सकती है। मैं एक और सुझाव दे दूं कि इस कते हुए सूतकी खादी बुनवानेमें बिलकुल वक्त न खोया जाये। इस कामके लिए किसी होशियार लड़केको बुनना सिखलाया जाये या कोई शिक्षक बुननेकी कला सीख ले। इनमें से कोई भी बात न हो सके तो स्थानीय बुनकरोंको ऐसा सूत बुननेको राजी किया जाये । [ अंग्रेजी ] यंग इंडिया, २४-५-१९२८ । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३८४
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