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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९

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गुजरात विद्यापीठ ध्येय १. विद्यापीठका मुख्य काम स्वराज्य-प्राप्तिके हेतुसे चलनेवाली प्रवृत्तियोंके लिए चरित्रवान्, शक्तिशाली, संस्कारी और कर्त्तव्यपरायण कार्यकर्त्ता तैयार करना है । २. विद्यापीठकी तरफसे चलनेवाली और उसकी मान्य की हुई हर संस्थाको पूरी तरह असहयोगी होना चाहिए और इसलिए वह सरकारका किसी भी तरह का सहारा नहीं ले सकती । ३. विद्यापीठ स्वराज्य और स्वराज्य-प्राप्ति के साधन अहिंसात्मक असह- योगके सिलसिलेमें कायम हुआ है। इसलिए शिक्षकों और संचालकोंको स्वराज्य लेने के लिए अहिंसा और सत्यके अविरोधी साधन ही अपनाने और काम में लेनेकी कोशिश करनी चाहिए । ४. विद्यापीठके संचालक और शिक्षक और विद्यापीठकी मान्य की हुई संस्थाएँ अस्पृश्यताको कलंकरूप माननेवाली और उसे मिटानेकी कोशिश करने - 1 वाली होनी चाहिए; किसी भी लड़के या लड़कीको उसके अछूत होनेके कारण बाहर न रखा जाये और भरती होनेके बाद उसके साथ दूसरी तरहका बरताव न किया जाये । ५. विद्यापीठकी संस्थाओंमें और उसकी मान्य की हुई संस्थाओंमें काम करनेवाले शिक्षक, संचालक वगैरा चरखेकी प्रवृत्ति में विश्वास रखनेवाले और अनिवार्य कारणोंके सिवा नियमसे कातनेवाले और आदतन | खादी पहननेवाले होने चाहिए । ६. विद्यापीठमें स्वभाषाको प्रधान पद दिया जायेगा और तमाम शिक्षा स्वभाषामें दी जायेगी । स्पष्टीकरण : दूसरी भाषाएँ सिखाते समय वे ही भाषाएँ काममें लाना अनुचित नहीं माना जाएगा । ७. विद्यापीठमें राष्ट्रभाषा हिन्दी - हिन्दुस्तानी का आवश्यक स्थान रहेगा टिप्पणी : हिन्दी - हिन्दुस्तानी वह भाषा है जिसे उत्तरके साधारण हिन्दू- मुसलमान बोलते हैं और जो नागरी या फारसी लिपिमें लिखी जाती है। ८. विद्यापीठमें औद्योगिक शिक्षाको बौद्धिक शिक्षाके बराबर ही महत्व दिया जायेगा और जो-जो उद्योग राष्ट्रके लिए पोषक हैं, उन्हींको स्थान दिया जायेगा, औरोंको नहीं । ९. भारतवर्षका उत्कर्ष शहरोंपर नहीं बल्कि गाँवोंपर निर्भर है, इसलिए विद्यापीठके ज्यादातर धन और शिक्षकोंका उपयोग खास तौरपर गाँवोंमें राष्ट्र- पोषक शिक्षाका प्रचार करने में ही किया जायेगा । . J १०. | शिक्षाका क्रम तैयार करते समय देहातियोंकी जरूरतोंको प्रधानता Gandhi Heritage Portal