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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९०

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३५८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय आपकी संवेदनाके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ । हृदयसे आपका, मो० क० गांधी श्री एफ० एच० ब्राउन बिलकुशा फोरेस्ट हिल, लन्दन, द० पू० २३ अंग्रेजी (एस० एन० १४३१७) की नकल तथा सी० डब्ल्यू० ४४४० से । सौजन्य : एफ० एच० ब्राउन ४०५. पत्र : जनकधारीप्रसादको आश्रम साबरमती २५ मई, १९२८ प्रिय जनकधारी बाबू, आपका पत्र मिला । यदि हमें ईश्वरके निकटतम होकर रहना है तो ईश्वर और हमारे बीच कुछ दुराव नहीं होना चाहिए। पति और पत्नीका प्यार बाधा है, क्योंकि हम जिस रूपमें इस प्यारको समझते हैं यह अनिवार्यतः एकान्तिक और व्यक्ति- गत है । २. ईश्वरमें विश्वासके लिए तर्क नहीं दिया जा सकता। यह विश्वास मस्तिष्कसे नहीं हृदयसे उपजता है, और हृदयकी चीजें स्वतः प्रेरित और नैसर्गिक होती हैं। हमारी कमजोरी और हमारी सीमाओंको ही हममें उस परिपूर्ण और असीमके प्रति विश्वासका भाव जाग्रत करना चाहिए। और यदि हममें यह विश्वास हो तो हम अवश्य ही तरह-तरहकी कठिनाइयों और दुःखोंसे मुक्त रहेंगे । ३. आप ऐसा क्यों कहते हैं कि चूंकि आप प्रति माह रु० ५० लेते हैं इसलिए आप जन-हित सम्पादन नहीं कर रहे हैं। हर आदमी, जो चरखा संघकी सेवा करता है, निस्सन्देह राष्ट्रकी सेवा करता है। इस गरीब देशमें बिना भोजनके काम लेनेकी आशा करना मूर्खता होगी। चूंकि आप समृद्ध वकील नहीं हैं, इसलिए दूसरे लोग आपका आदर या आपसे स्नेह नहीं करते इसमें दुःख मनानेका कोई कारण नहीं है । परन्तु यदि आप सम्पत्ति और अनुकूल लोकमतके बिना भी प्रसन्न रह सकते हैं तो यह खासा बधाईका विषय है । बाबू विन्देश्वरीप्रसादको आपका संरक्षण क्यों मांगना चाहिए ? यदि उन्हें दृढ़ विश्वास है कि वकालत छोड़ देना ठीक रहेगा तो जैसे कि हमारे अन्य लाखों देशवासी कर रहे हैं उन्हें भी आये पेट खाने भरकी मजदूरी कमानेमें प्रसन्नताका Gandhi Heritage Portal