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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९२

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४०७. पत्र : किशोरलाल मशरूवालाको चि० किशोरलाल, मैंने तुम्हारे दोनों पत्र ऐसा लगता है कि मैंने सामने नहीं रखा गया है । शुक्रवार, ज्येष्ठ सुदी ६, १९८४ [ २५ मई, १९२८] ध्यानपूर्वक पढ़े हैं । जिस प्रकार जो कहा था वह बिलकुल वैसा ही तुम्हारे जिन परिवर्तनोंका मैंने सुझाव दिया है उनमें कुछ नई बात भी है। हमने आश्रमवासीकी जो व्याख्या की है, उसमें कोई फेरफार नहीं किया है। उससे अभिप्राय तो इतना ही होगा कि जो आदर्श हमारे सामने हमेशा रहा है उसका अनुसरण करनेका और भी अधिक प्रयत्न करें। जबरदस्ती तो किसीसे न की है और न करनेकी इच्छा ही है । आज दो भाइयोंने अपनी रसोई अलग करनेकी इच्छा प्रकट की थी, उनपर दबाव डालनेसे मैंने इनकार कर दिया । इसलिए मुझे तो कहीं भी दबाव नहीं दिखाई देता । मीठा आग्रह जरूर है । प्रत्येक वस्तु साफ-साफ समझाता रहता हूँ । जो लोग आश्रममें आये हैं, उन्हें आश्रममें होनेवाले नैतिक विकास या परिवर्तनके अनुसार आचरण करना चाहिए। मेरा यही मत है । जो आये हैं उन्हें यह तो नहीं कहना चाहिए "हम तो अमुक नियमोंका पालन करेंगे और नये नियम बनाये जायेंगे तो उनपर अमल करना हमारे लिए वचनभंग करना होगा । " ऐसी स्थितिमें कोई भी संस्था नहीं चल सकती । स्थूल वस्तुओं जैसे वेतन अवधि आदिके विषय में निश्चय हो सकता है । सामान्य तौरपर हमारे यहाँ तो नैतिक बन्धनके सिवा दूसरा कुछ अंकुश ही नहीं है । यह सब होनेपर भी, ब्रह्मचर्यकी सबके साथ खूब चर्चा करनेपर ही, सबके द्वारा उसके पालनकी आवश्यकता स्वीकार करनेपर ही उससे सम्बन्धित नियमका पालन करनेका निश्चय किया गया था। इस नियमको पढ़कर सुनाते समय मैंने यह अवश्य कहा था कि जो इस नियमका पालन नहीं कर सकते या नहीं करना चाहते वे जा सकते हैं । अभी संयुक्त रसोई ठीक चल रही है। इस समय तुम्हें और कष्ट नहीं दूंगा । इतना भी अनिच्छापूर्वक लिखा है । सच तो यह है कि बीमार होते हुए दूर बैठे-बैठे तुम्हें यहाँ किये जा रहे परिवर्तनोंके विषयमें सोचनेका कष्ट ही नहीं उठाना चाहिए। ऐसा करना दोषपूर्ण भी है । अब तबियत कैसी रहती है ? इस बार सान्ताक्रूजमें नहीं रहूँगा । यहाँ आना चाहो तो आ सकते हो. शरीर इस लायक तो है। इलाज तो यहाँ भी हो सकता - Gandhi Heritage Portal