पत्र : महादेव देसाईको ३६१ है । जलवायु भी वहाँसे अच्छी है । किन्तु यदि आनेका निर्णय करो तो मैं चाहता कि वापस न जानेका विचार करके ही । बापूके आशीर्वाद गुजराती (एस० एन० ११८०२ ) की फोटो - नकलसे । ४०८. तार : हरिलाल देसाईको [ २५ मई, १९२८ के पश्चात् ] पत्र मिला । बढ़ाये हुए अंशकी अदायगी जाँचसे पहले असम्भव । यदि स्वतन्त्र जाँच कराई जाये, जिसमें सबूत पेश करने और सरकारी गवाहोंसे जिरह करनेका अधिकार दिया जाये, जब्त की हुई जमीनें वापस दे दी जायें [ और ] सत्याग्रही कैदियोंको रिहा कर दिया जाये तो मूल लगानकी अदायगी की जा सकती है। लोग पंच न्यायालयका निर्णय स्वीकार कर लेंगे । तार द्वारा उत्तर दीजिए : बारडोली वल्लभभाई । अंग्रेजी (एस० एन० १२७०५ ) की फोटो नकलसे । ४०९. पत्र : महादेव देसाईको २६ मई, १९२८ चि० महादेव, हर बार तुम मुझे यह अच्छी भेंट भेज देते हो । जो बात स्वप्न में भी मेरे मनमें न थी, उसकी तुम सबने कैसे कल्पना कर ली ? परसों मैंने जो कुछ कहा था वह किसी एककी जरासी भी टीका करनेके उद्देश्यसे नहीं कहा था। जो कुछ कहा था वह ८० व्यक्तियोंके लिए कहा था । जो संयुक्त रसोईमें शामिल नहीं हो सकते उनके लिए मेरे मनमें कोई आक्षेप या निन्दाकी बात न थी और न है । फिर उस सभामें इसकी चर्चा करनेकी बात ही क्या थी ? इसलिए मेरे मनमें हिंसा नहीं थी । इतना कह देना ही काफी है । निन्दा तो मैंने सिर्फ उसी रात की थी । उस समय भी मुझे विरोधका तनिक भी दुख नहीं हुआ था । दुख तो सबकी ओछी वृत्ति देखकर हुआ था। नरहरिकी निश्छलता तो बहुत ही अच्छी लगी; किन्तु उसकी और १. यह तार वल्लभभाई पटेल द्वारा हरिलाल देसाईके २५ मईके पत्रके उत्तर में भेजा गया था। इसका मसविदा गांधीजीने तैयार किया था । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९३
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