३६२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय बाकी सबकी बुद्धिका हरण हो जाना अच्छा नहीं लगा । यदि उनकी बुद्धि मैंने हर ली हो तो मैं कैसा निकम्मा व्यक्ति हूँ। ऐसी स्थितिमें मेरा क्या धर्म है यह सोचते- सोचते मैं जाग गया और तुरन्त निश्चिन्त हो गया । तुम्हें मालूम है कि पिछले नौ दिनोंमें मेरा वजन दो रतल बढ़ा है। तो मैं कितना निश्चिन्त रहा होऊंगा ? गुजराती (एस० एन० ११४४८ ) की फोटो नकलसे । ४१०. पत्र : सी० एफ० एन्ड्रयूजको बापूके आशीर्वाद सत्याग्ग्रह आश्रम साबरमती २६ मई, १९२८ प्रिय चार्ली, मुझे तुम्हारे पत्र नियमित रूपसे मिलते रहे हैं। मैंने महादेवको तुम्हें मी पत्र लिखनेके लिए कहा था। मुझे आशा है कि उसने वैसे ही किया होगा । उसे वल्लभभाईकी मददके लिए हफ्तेमें दो बार बारडोली जाना होता है । इसलिए वह आज यहाँ नहीं है । मैं हमेशा तुम्हारे बारेमें सोचता रहता हूँ, परन्तु तुम्हें पत्र लिखनेका समय कभी नहीं मिलता। अलबत्ता, मुझे चिन्ता नहीं होती, क्योंकि मुझे मालूम है कि तुम मुझसे पत्रोंकी अपेक्षा नहीं रखते हो । मेरा हृदय गुरुदेव के लिए उमड़ा पड़ता है। मेरी कामना है और मुझे विश्वास है कि उनका स्वास्थ्य इस समुद्री यात्राको अच्छी तरह बर्दाश्त कर सकेगा और यूरोपमें वे अपने-आपको पूरा विश्राम देते रहेंगे तथा नई शक्ति लेकर वापस आयेंगे। मुझे यह भी आशा है कि तुम अपने थके शरीरको और इससे भी ज्यादा थके हुए मस्तिष्कको विश्राम दोगे । परन्तु मुझे लगता है तुम शायद वैसा नहीं कर सकोगे । मैं आश्रमको सुधारनेमें और उसे उसके स्वीकृत आदर्शोंके अनुरूप बनानेपर ध्यान दे रहा हूँ । इसलिए हम लोग बड़े पैमाने पर संयुक्त रसोड़ा चला रहे हैं। ८० लोग एक साथ भोजन करने बैठते हैं, जहाँ वे अपने-आपको और अधिक सेवा कार्यके लिए उत्सर्ग करनेका प्रयत्न करते हैं। परन्तु समयकी कमीके कारण मैं और ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा । १. ऑक्सफोर्ड विद्यालय में हिबट भाषण देनेके लिए जाते हुए रास्तेमें कवि रवान्द्रनाथ बीमार पड़ गये थे। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९४
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