३६४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय उनकी मरम्मत करना आता हो; वे गाँवोंके लायक सीना-पिरोना जानते हों; उनके मोतीके दानों जैसे अक्षर हों; वे साधारण लिखनेकी कला जानते हों; उन्हें देशी अंक जबानी याद हों; वे 'रामायण', 'महाभारत' वगैरा पुराने साहित्य और उसके आध्यात्मिक और आधुनिक अर्थोके जानकार हों; देहाती खेल जानते हों; तन्दुरुस्ती के कानून जानते हों; उन्हें घरेलू चिकित्सा अच्छी तरह आती हो, यानी वे मामूली बीमारियोंकी जाँच कर उनका इलाज जाननेवाले हों; वे गाँव के घूरे, तालाब और कुएँ वगैरा साफ करनेकी कला जाननेवाले हों; वगैरा-वगैरा। गरज यह कि इन विनय-मन्दिरोंमें इस तरहकी शिक्षा दी जाये, जिससे उनमें इतनी योग्यता आ जाये कि वे गाँवोंकी हर तरहसे सेवा करनेके लिए तैयार हो सकें। और इस तरहकी शिक्षा पर जो कुछ खर्च हो, वह प्राथमिक शिक्षा के लिए ही किया गया है, ऐसा समझा जाये। हम गाँवोंमें सचमुच प्रवेश करने योग्य, ऐसा करने या कर सकनेपर ही होंगे । यह शंका हो सकती है कि जहाँ हमने ऐसे परिवर्तन किये और ऐसा आदर्श साफ तौरपर जाहिर किया कि हमारे विनय-मन्दिर खाली हुए। ऐसा ही हो तो मैं सत्यके खातिर इस आपत्तिका स्वागत करनेको तैयार हो जाऊँगा । लेकिन जबतक विद्यापीठका देहाती शिक्षाका ध्येय कायम है, तबतक ऐसा न करना असत्य और द्रोह समझा जायेगा । मगर मेरा विश्वास और अनुभव यह है कि अगर हम अपने उद्देश्योंके प्रति एकनिष्ठ रहें, तो जनता अन्तमें उन्हें पहचान लेती है और उन्हें प्रोत्साहन देती है । तथाकथित निष्फलताके कारण ढूंढनेपर हमें मालूम होगा कि ध्येयको माननेवाले बेवफा, कच्चे या ढीले थे । संशयात्माका तो सदा नाश ही होता है, और उसके नाशको न देखकर लोग उसके आदर्शकी कमी या निष्फलताको देखते हैं । अगर हमारे विद्या मन्दिरोंमें श्रद्धावान और त्यागी शिक्षक हों, तो मेरी पक्की राय है कि वे विद्यार्थियोंसे भर जायें। लोग सच्ची चीजको पहचान सकते हैं। बहुत वार ऐसा होनेमें देर होती देखी जाती है । पर वह निरा भ्रम होता है। यह निरपवाद नियम है कि सही रास्तेसे कमसे कम देर लगती है । लोगोंकी कमजोरियोंको, उनकी भोगवृत्तिको उत्तेजन देनेवाली संस्था घड़ी-भरमें भर जाये तो इससे क्या ? इससे कोई उसकी सफलता साबित नहीं होती । मेरी दृष्टिको अपनानेका एक यह नतीजा तो हो सकता है कि जो विद्यार्थी सरकारी पाठशालाओंकी-सी शिक्षा पानेकी आशासे आये होंगे, जो सिर्फ शहरी जीवन बितानेकी योग्यता प्राप्त करनेकी उम्मीद रखकर आये होंगे, वे निराश होकर हमारे मन्दिर छोड़ देंगे। मगर ऐसा हो तो अच्छा ही है। हम और वे दोनों गलत स्थितिसे बच जायेंगे और एक-दूसरेकी शुद्ध सेवा करेंगे । जिस विचारसे मैंने इस लेखमालाको शुरू किया था, उस विचारको जरा और आगे ले जाकर मैं इस मालाको बन्द करनेकी बात सोचता हूँ । और फिर इस बारेमें मेरे पास जो थोड़े-से सवाल हैं, उनकी चर्चा करनेकी आशा रखता हूँ । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९६
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