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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/३९७

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प्राथमिक शिक्षा -- ३ ३६५ प्राथमिक शिक्षाके पहले सालमें अक्षर-ज्ञान बिलकुल न सिखानेका विचार सही हो, तो उसका कुछ-न-कुछ अच्छा परिणाम विनय-मन्दिरों और महाविद्यालयोंमें भी आना चाहिए । आजकल किताबी ज्ञानका प्रचार बहुत बढ़ गया है। नित नई पुस्तकें निकला ही करती हैं। जिसकी भाषा जरा भी मंजी हुई है, जिसने थोड़ा बहुत भी विचार किया है, वह अपने विचार प्रकट करनेको अधीर बन जाता है और यह समझता हैं कि उन विचारोंको प्रकट करनेसे देशकी सेवा होती है। नतीजा यह होता है कि विद्यार्थियोंके दिमागपर और उनके माँ-बापकी जेबोंपर असह्य बोझ पड़ता है । विद्यार्थियोंकी बुद्धि कुण्ठित हो जाती है। उनके दिमाग तरह-तरह के तथ्योंके संग्रह-स्थान बन जाते हैं और इससे उनमें मौलिक विचारोंके लिए जगह नहीं रह जाती। और हकीकतें भी अपनी-अपनी जगहपर ठीक बैठ जानेके बजाय, जैसे एक आलसीके घरमें सामान इधर-उधर बिखरा पड़ा रहता है, वैसे ही बेचारे इन विद्यार्थियोंके दिमाग में भी बिखरी पड़ी रहती हैं । इनका उपयोग न वे कर सकते हैं, न जनताको उनसे लाभ होता है । इसलिए मेरी रायमें तो आज जो बहुतेरी किताबें छपती हैं, उन्हें मैं विद्यार्थियोंके आगे हरगिज नहीं रखूंगा। लिखना-पढ़ना जाननेवाले विद्यार्थी भी बहुत-सी शिक्षा तो शिक्षकके मुंहसे ही पाते हैं। वे कमसे कम पुस्तकें पढ़ें, मगर जो पढ़ें उसपर विचार करें और विचार करनेसे जो चीज अपनाने लायक लगे उसपर अमल करने लगें। ऐसा करनेसे विद्यार्थीका जीवन सरस, विचारमय, विवेकमय निश्छल, पवित्र और तेजस्वी होगा। ऐसी पढ़ाई गरीब जनताको शोभा देगी। ऐसी पढ़ाई विद्यार्थी और जनता दोनोंको फायदा पहुँचायेगी । इसलिए विद्यापीठके सामने जो गूढ़ प्रश्न हैं, उसके हल होनेका दारोमदार मौजूदा शिक्षकोंकी विद्यापीठके ध्येयोंको पचानेकी और उनके अनुसार चलनेकी खूब कोशिश करनेकी शक्तिपर है । [ गुजरातीसे ] नवजीवन, २७-५-१९२८ Gandhi Heritage Portal