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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४०४

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प्रिय शंकरन्, ४२३. पत्र : शंकरन्को सत्याग्रह आश्रम साबरमती ३० मई, १९२८ तुम्हारा विचार बिलकुल सही है। हमें बारडोलीके लोगोंके लिए विदेशी अथवा मिलके कपड़ोंके पार्सल हरगिज नहीं लेने चाहिए। और न ही उन्हें उसकी कोई इतनी जरूरत है । वे भूखे नहीं मर रहे हैं। उन्हें खिलाने या उन्हें कपड़ा देनेसे खर्चेका कोई सम्बन्ध नहीं है । जो खर्चा किया जा रहा है वह अधिक संख्यामें स्वयंसेवकों का भार वहन करनेके लिए और व्यापक प्रचार चलाये रखनेके लिए हो रहा है । अंग्रेजी (एस० एन० १३३९६) की फोटो - नकलसे । प्रिय च० रा०, ४२४. पत्र : च० राजगोपालाचारीको हृदयसे तुम्हारा, सत्याग्रह आश्रम साबरमती ३० मई, १९२८ मैंने आपकी अभय आश्रम सम्बन्धी सराहना प्रकाशित न करनेके कारणोंपर आपसे बहस नहीं की है और मजदूरोंके सम्बन्धमें मेरा खयाल है, मैंने आपको अपने कारण बता दिये हैं। अभय आश्रमके सम्बन्धमें आपकी सराहना बिलकुल उपयुक्त है । परन्तु उन्हें लाभ पहुँचानेके बजाय उस सराहनासे सब तरहके ईर्ष्या-द्वेष बढ़नेकी सम्भावना थी और मुझे लगा कि यदि ईर्ष्या-द्वेषको न बढ़ाया जाये तो ज्यादा अच्छा है । अंग्रेजी (एस० एन० १३३९७) की फोटो नकलसे । १. राजगोपालाचारीने एक लेखमें १९२७ के अन्तमें हुए दंगोंके सिलसिले में अभय आश्रम (कोमिल्ला) के कार्यकर्ताओं के प्रयासोंकी सराहना की थी। देखिए " पत्र : च० राजगोपालाचारीको ", २७-५-१९२८ भी । Gandhi Heritage Portal