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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४०५

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४२५. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको सत्याग्रह आश्रम साबरमती ३० मई, १९२८ प्रिय सतीश बाबू, आपका दिलचस्प पत्र मिला । दुग्धाहारसे निश्चय ही आपको बहुत लाभ होगा । मुझे निश्चय है कि कटि-स्नानसे भी आपको लाभ होगा। यदि निखिल कटि-स्नान सहन नहीं कर सकता तो उसके पेटपर छ: इंच लम्बी और तीन इंच चौड़ी मिट्टीकी पट्टी बाँध कर देखिए। यदि कुछ समयके लिए निखिलको केवल दूध और साफ किये हुए पानी पर रखा जाये, और कब्ज हो तो नियमित रूपसे हर चौबीस घंटे बाद एनीमा दिया जाये तो शायद अच्छा रहेगा। जितना दूध वह आरामसे पी सके पी ले परन्तु उससे ज्यादा नहीं । यहाँ मैं एक रोगी के मामलेमें, जिसकी बीमारी काफी बिगड़ी हुई कही जा सकती है इस नुस्खेका प्रयोग कर रहा हूँ और इसमें काफी सफलता मिली है। इस इलाजके बारेमें आप किसी डाक्टर मित्रसे सलाह ले सकते हैं। मुझे आशा है कि श्री बिड़लाके साथ आपको सफलता मिलेगी । मैं चाहता हूँ कि वे आपकी सहायता, आप उन्हें उनके व्यापारमें जो सहायता देंगे उसके बजाय इसी दृष्टिसे करें कि आपके खादी-प्रचारकी बात उन्हें ठीक मालूम होती है । आपका उनकी सहायता करना निस्सन्देह उचित है और आप जितनी सहायता उन्हें दे सकें जरूर दें । परन्तु यदि खादीको सफल होना है, तो वह केवल अपने गुणोंके आधार पर और खादी संस्थाओंकी व्यापारिक क्षमताके आधार पर ही सफल होगी । क्या मैंने आपको श्री बिड़लाके एक पत्रमें से एक उद्धरण भेजा था या उसके बारेमें कुछ लिखा था ? इस अंशमें श्री बिड़लाने आपके खादी-प्रेम और महान् आत्म-त्यागकी बड़ी प्रशंसा की है, किन्तु प्रतिष्ठानका गठन जिस तरह हुआ है उसके या आपने अपनी खादी-प्रचारकी योजना उन्हें जैसी समझाई हो, उसके अनुसार आपकी प्रचार-योजनाके बारेमें वे आश्वस्त नहीं हैं। यह एक साल पहलेकी बात है । यह बात मैं आपसे, आपने अपने पत्रके निम्नलिखित वाक्यमें जो कहा है उसीपर जोर डालनेके लिए कह रहा हूँ । आपका वाक्य इस प्रकार है : " यदि उन्हें विश्वास हो जाये कि मैं यहाँ जो काम कर रहा हूँ वह उनके पूर्ण समर्थनके योग्य है तो मुझे पूरी आशा है, कि जैसे वे हजारों खर्च करते हैं वैसे वह लाखों भी Gandhi Heritage Portal