बारडोलीकी परीक्षा ३७५ दाण्डिक पुलिस (प्युनिटिव पुलिस) को तैनात नहीं किया है और 'सैनिक शासन घोषित नहीं किया है । हमें अबतक यह जान लेना चाहिए था कि 'दाण्डिक पुलिस' या 'सैनिक शासन' का क्या अर्थ होता है । यह तो स्पष्ट है कि भय प्रदर्शनके इस ताजा तरीकेसे सरकार लोगोंको किसी न किसी तरहकी हिंसाके लिए प्रेरित करना चाहती फिर चाहे वह हिंसा कितनी ही छोटी क्यों न हो -- जिससे उसे सैनिक शासन घोषित करनेका बहाना मिल जाये । है -- क्या बारडोलीनिवासी इस अन्तिम परीक्षामें खरे निकलेंगे ? वे अपने व्यवहारसे भारतीय जनताको चकित तो कर ही चुके हैं। अत्यन्त अधिक उत्तेजनाके बावजूद उन्होंने अबतक वीरोंके जैसा धैर्य दिखाया है । क्या वे उस बड़ीसे बड़ी उत्तेजनाको भी, जो उन्हें दी जा सके सहन कर सकेंगे ? अगर वे सहनकर सके, तो फिर उन्होंने जग जीत लिया। जो लोग सम्मानको सबसे प्यारी वस्तु मानते हैं, उनके लिए जेल, जब्ती, निर्वासन, मौत वगैरह सभी मामूली चीजें होनी चाहिए। अगर जुल्म असह्य हो जाये तो लोग बारडोलीकी भूमिको, जिसे वे अब तक अपना समझते रहे हैं, छोड़कर दूसरी जगह जा बसें । जिस घरमें प्लेग घुस जाये, उसे खाली कर देने में ही बुद्धिमानी है । अत्याचार एक तरहका प्लेग ही है और जब ऐसी आशंका हो कि इससे हमें क्रोध आ जायेगा या हम कमजोर पड़ जायेंगे तब ऐसे स्थानको छोड़ देनेमें ही बुद्धिमानी है । इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं, जब कि वीर पुरुषोंने जुल्मके आगे सिर झुकानेकी अपेक्षा अपना देश छोड़ देना ही ज्यादा अच्छा समझा है । खैर, मैं आशा करता हूँ कि ऐसा कदम उठानेकी जरूरत नहीं पड़ेगी । शुभेच्छु मित्रों द्वारा बीच-बचाव करनेकी खबरें सुननेमें आई हैं। बीच-बचाव करनेका उन्हें हक है, बीच-बचाव करना उनका कर्तव्य भी हो सकता है। मगर ये मित्र इस आन्दोलनका महत्व समझें । उन्हें जानना चाहिये कि वे निर्बल लोगोंकी ओरसे नहीं बोल रहे हैं और न किसी कमजोर चीजकी वकालत कर रहे हैं। बारडोलीवालोंके पक्षमें न्याय है । वे दयाकी भीख नहीं माँगते, वे केवल न्याय माँगते हैं । वे नहीं चाहते कि कोई उनके दावेको सच्चा माने । वे तो केवल एक स्वतन्त्र, खुली और न्यायिक जाँच कराना चाहते हैं । और वे ऐसी अदालतके फैसलेको माननेके लिए तैयार हैं । इस जाँचको इनकार करनेके मानी हैं, न्याय करनेसे इनकार करना और सरकार अबतक यही करती आई है। लोगोंके हाथोंमें इसका इलाज यह है कि वे स्वयंकष्ट उठायें। ऐसे मामलेमें, अधिकसे-अधिक और कमसे कम दोनोंका ही प्राय: एक ही अर्थ होता है । जो लोग कोई शिकायत दूर करानेके लिए आप ही कष्ट सहनेपर भरोसा रखते हैं, वे उस शिकायतको बढ़ाकर नहीं कहेंगे, इसलिए जो लोग इस आन्दोलनका रहस्य समझे बिना, बीच-बचाव करने जायेंगे, वे इसे नुकसान पहुँचायेंगे । उन्हें जानना चाहिए कि इस आन्दोलनको न तो सहज ही बन्द किया जा सकता है और न उसकी प्रतिष्ठाको बट्टा लगने दिया जा सकता है । जनताको भी सत्याग्रहियोंके प्रति कर्त्तव्यका पालन करना है । धनके लिए वल्लभभाईकी अपीलका लोगोंकी ओरसे ठीक उत्तर मिलना शुरू हो गया है। यह भी Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४०७
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