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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४०९

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पत्र: शचीन्द्रनाथ मित्रको

दक्षिणी युवक अपनी कुछ महँगी विलासिताओं, जैसे सिगरेट पीना, घुड़दौड़ोंमें जाना, नाचघरोंमें जाना आदि, को त्याग भर दें, तो उसीसे बहुत बड़ी राशि एकत्र हो जाये। सभी धर्मोमें यह विधान किया गया है कि लोग अपनी-अपनी आमदनियोंका एक हिस्सा धार्मिक कार्योंके लिए अलग निर्धारित करें। दुर्भाग्यसे आजकलके युवकोंने धर्मको अधिकतर तो तिलांजलि ही दे दी है। किन्तु यदि निरपवाद रूपसे सभीके द्वारा धार्मिक कार्योंके लिए अपनी-अपनी आमदनियोंका एक हिस्सा अलग किये जानेकी प्रथा पुनर्जीवित की जा सके तो अस्पृश्यता जैसे कार्योंके लिए 'अनुकूल समय' की प्रतीक्षा कभी न करनी पड़े।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया ३१-५-१९२८
 

४२९. पत्र: शचीन्द्रनाथ मित्रको

सत्याग्रह आश्रम
साबरमती
३१ मई, १९२८

प्रिय मित्र,

आपका पत्र मिला। अपने खयालसे तो मैंने जो सुझाव दिये हैं यदि उन्हें अपनाया जा सके, तो उनके जरिये मैंने आपके प्रश्नको सुलझा दिया है, क्योंकि विद्यार्थी, जब वे विद्याध्ययन कर रहे हों, खुद कताई करने और अपने प्रयोग और पहरावेके लिए खद्दर अपनानेसे ज्यादा या बेहतर कुछ और नहीं कर सकते। और यदि वे इतना भी नहीं कर सकते तो उनके द्वारा किसी ऐसे कामको कर सकनेकी आशा नहीं है, जिससे देशको कोई ठोस लाभ हो।

हृदयसे आपका,

अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३६१२) की माइक्रोफिल्म से।