प्रिय गिडवानी, ४३१. पत्र : अ० टे० गिडवानीको सत्याग्रह आश्रम साबरमती ३१ मई, १९२८ मैं सोच ही रहा था कि मुझे आपका पत्र कब मिलेगा। इसलिए जब गिरधारीने मुझे आपका पत्र दिया तो मुझे प्रसन्नता हुई । मैं तो इन व्यक्तिगत बातोंको भी जिन्हें आप मामूली कहते हैं उतना ही विचारणीय मानता हूँ जितना कि बारडोलीको; क्योंकि मैं सहयोगियोंके बारेमें सब कुछ जानना चाहता हूँ। मैं आपकी सब कुछ त्याग कर एकदम बारडोली चले आनेकी इच्छाको समझता हूँ । परन्तु अभी ऐसा करनेका अवसर नहीं आया है। जब वह वक्त आयेगा आप देखेंगे कि मैं रत्ती भर संकोच किये बिना आपको बुला भेजूंगा । और मैं जानता हूँ कि आप एक अच्छे सिपाहीकी तरह, बुलाये जानेपर तुरन्त आ जायेंगे। लेकिन अभी फिलहाल तो वल्लभभाईके पास काफी कार्यकर्ता हैं । मुझे खुशी है कि आपकी सेहत अब काफी बेहतर है और मुझे मालूम है कि गंगाबह्नने अपनी सारी उदासी झाड़ फेंकी है । परन्तु उससे कहिए कि उसे अपनी गुजराती भूल नहीं जाना चाहिए। और यदि वह आपके काममें अबतक हाथ नहीं बँटा रही है तो अब जरूर बँटाए । वह कन्या स्कूलोंमें जाकर उनका संगठन कर एवं उन्हें तकली वगैरह सिखा कर बहुत कुछ कर सकती है । साम्प्रदायिक समस्या हमेशा और हर जगह ही हमारे साथ है । मुझे आशा है कि इससे निबटना आपकी ताकतसे बाहर नहीं होगा । अंग्रेजी (एस० एन० १४४७५) की फोटो नकलसे । हृदयसे आपका, Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४११
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