३८४ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय प्रश्न - पुरानी परम्पराके हिमायती विद्यार्थियोंमें गुरु-भक्ति उत्पन्न करनेकी कोशिश करते हैं। यह समझानेका प्रयत्न करते हैं कि हमें गुरुकी प्रसन्नतासे ही विद्या प्राप्त हो सकती है, अन्यथा नहीं । गुरुकी भक्ति, सेवा, शुश्रूषा न करें तो गुरु बुरा मानकर विद्या देनेसे जी चुराता है। जिससे वह ऐसी बेईमानी न करे, इसलिए उसकी खुशामद करनी चाहिए। क्या यही गुरुभक्तिकी मीमांसा है ? उत्तर -- मैं गुरुभक्तिको योग्य मानता हूँ । किन्तु प्रत्येक शिक्षक गुरु नहीं होता । गुरु-शिष्यका सम्बन्ध आध्यात्मिक और स्वयं स्फुरित होता है; वह कृत्रिम नहीं होता, वह बाहरके दबावसे पैदा नहीं होता। ऐसे गुरु आज भी हिन्दुस्तानमें हैं। (यहाँ मैं मोक्षदायी गुरुका उल्लेख नहीं कर रहा हूँ, यह चेतावनी देनेकी जरूरत नहीं होनी चाहिए।) ऐसे गुरुकी खुशामद सम्भव ही नहीं है। ऐसे गुरुके प्रति आदर स्वाभाविक होता है । गुरुका प्रेम भी स्वाभाविक ही होता है। इसलिए एक देने और दूसरा लेनेको हमेशा तैयार ही रहता है। बाकी सामान्य ज्ञान तो हम हरएकके पाससे ले सकते हैं। किसी बढ़ईके साथ मेरा कोई सम्बन्ध न हो, तो भी उसके पाससे उसके दुर्गुण जानते हुए भी मैं बहुत कुछ ले सकता हूँ, जिस तरह दुकानदारसे सौदा खरीदते हैं, उसी तरह उससे मैं बढ़ईगिरीका ज्ञान खरीद लेता हूँ । हाँ, यहाँ भी एक प्रकारकी श्रद्धा आवश्यक है। जिस बढ़ईसे मैं बढ़ईगिरीका ज्ञान लेना चाहता हूँ, उसके बढ़ईगिरीके ज्ञानमें मुझे श्रद्धा न हो तो मैं वह ज्ञान नहीं पा सकूंगा । गुरु-भक्ति अलग ही विषय है। जहाँ शिक्षाका उद्देश्य चरित्र गढ़ना ही हो, वहाँ गुरु-शिष्यका सम्बन्ध अत्यावश्यक है; और अगर वहाँ शुद्ध गुरु-भक्ति न हो तो चरित्र गढ़ा ही नहीं जा सकता । [ गुजरातीसे ] नवजीवन ३-६-१९२८ Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४१६
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