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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२०

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३८८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मयं उनके विरुद्ध जाये तो भी वह पैसा न भरेंगे या वल्लभभाई उनकी सहायता नहीं करेंगे, ऐसा मान बैठने के लिए सरकारके पास कोई कारण नहीं है । अत: अपने स्वाभिमानकी खातिर भी हम पैसा बैंकमें रखनेकी शर्तको कबूल नहीं कर सकते। लोगोंका पूरा इकरारनामा सार्वजनिक रूपसे होगा । वल्लभभाईका इकरारनामा भी सार्वजनिक रूपसे होगा। बढ़ी हुई रकमको छोड़कर लगान अर्थात् पाँच लाख तो लोग भर ही देंगे। बाकीकी रकमको वसूल करना तो सरकारके लिए बहुत आसान काम होना चाहिए। किसी भी रीतिसे बढ़ी हुई रकमको पहले वसूल करनेकी बातमें मुझे वदनीयतीकी गन्ध आती है । नाममात्र के लिए किसी समितिको नियुक्त कर दिया जाये तो उससे हमें सन्तोष नहीं होगा। फिर यह समिति निष्पक्ष और खुली होनी चाहिए। लोगोंके इतना साहस दिखानेके बाद हमें ढीला पड़नेका कोई अधिकार नहीं है । अन्तमें यदि लोगोंको हारना ही पड़ा तो हारेंगे, किन्तु हमें तो उनके हारनेमें योग नहीं देना चाहिए । आप महाबलेश्वर कब और किसके निमन्त्रण पर जायें, इसका विचार आप मुझसे ज्यादा अच्छी तरह कर सकते हैं। अभी तो ऐसा नहीं लगता कि स्वामीके पत्र में से कोई बात रह गई हो । [ गुजरातीसे ] बापू महादेव देसाईकी हस्तलिखित डायरी सौजन्य : नारायण देसाई ४४४. पत्र : बेचर परमारको आश्रम बुधवार, ज्येष्ठ वदी ३, [६ जून, १९२८ ] भाईश्री ५ बेचर, तुम्हारा पत्र मिला । उसका एक जवाब तो यह है कि जो धन्धा नीतिके विरुद्ध हो वह सदा ही त्याज्य है । दूसरा यह है कि वर्णं सिर्फ चार हैं और उनमें अनीति नहीं है । और इसलिए अपने वर्ण में रहते हुए, माता-पिताने जो अनीति ग्रहण की हो उसे छोड़ दें, ताकि उसी वर्णमें रहकर दूसरा काम किया जा सके । मोहनदासके आशीर्वाद गुजराती पत्र ( जी० एन० ५५७२ ) की फोटो नकलसे । १. वर्ण-व्यवस्थाके उल्लेखसे लगता है कि यह पत्र १९२८ में ही लिखा होगा। देखिए " पत्र: बेचर परमारको ", २३-६-१९२८ तथा पिछले शीर्षककी पाद टिप्पणी । Gandhi Heritage Portal