20 दोनों पहलू ३९१ विभागने यह भी बता दिया है कि पठानोंको लानेके क्या मानी हुए हैं। वैसे तो प्रचार विभागकी मददके बिना भी हम इसके अर्थका सहज ही अनुमान लगा सकते थे । पठानोंको चाहे सरकार नौकर रखे या सामान्य लोग मगर सब जानते हैं कि ये दोस्त किसलिए रखे जाते हैं। बहरहाल कोई पठानोंको यहाँ लानेका कहीं यही सर्वमान्य अर्थ न लगा ले, इसलिए विज्ञप्ति कहती है, "इन पठानोंपर निराधार आरोप लगाये गये हैं । सरकारको विश्वास है कि उनका बरताव हर तरहसे आदर्श रहा है ।" इस कैफियत पर किसे हँसी न आयेगी। जैसा कि सरकारका दावा है, अगर पठानोंको बेठियोंकी' जगहपर बुलाया गया है, क्योंकि उन्हें जाति-च्युत करनेकी धमकी दी गई ' बताई जाती' है, तो फिर यह सवाल पूछना तो फिर यह सवाल पूछना युक्ति-संगत है कि दूसरी जगहोंसे वेठियोंको बुलाने या किन्हीं दूसरे कुछ नम्र लोगोंको लानेके बदले ये पठान ही क्यों चुने गये हैं ? सरकार तो इस बातकी हँसी उड़ाती है और उसे अविश्वसनीय बताती है कि “एक जिम्मेवार सरकारी अधिकारीकी नजरके नीचे पाँच- पाँच पठानोंके पाँच दल, नब्बे हजार मनुष्योंकी बस्तीको आतंकित कर सकते हैं । फिर भी हिन्दुस्तानके लोगोंको अनुभव है कि अधिकारका बल पाकर एक भी पठान सारे गाँवमें क्या कर सकता है। निस्सन्देह यह हमारे लिये एक अपमानकी बात है कि पठान या ऐसे ही कोई दूसरे आदमी बहुसंख्यक समुदायोंको आतंकित कर सकते हैं, मगर दुर्भाग्यसे इस आतंकित और भयाक्रान्त हिन्दुस्तान में यह रोजमर्राकी बात है । और अगर बारडोलीकी हमारी इस लड़ाईसे और कुछ भी नहीं हुआ, लोगोंने केवल आदमियों और अफसरोंका डर छोड़कर पठानोंको मित्र बना लिया तो भी मैं समझँगा कि बारडोलीकी लड़ाई अच्छी तरह लड़ी गई है। " मगर विज्ञप्तिमें केवल चल सम्पत्तिकी जब्तीके बारेमें जो जोर जबरदस्तीके तरीके अपनाये जा रहे हैं उन्हें ही गिनाकर सन्तोष नहीं किया गया है। उसमें जमीनकी जब्तीका भी जिक्र किया गया है । सरकारको यह कबूल करते हुए भी शर्म नहीं आई कि " विज्ञप्ति निकलनेके समय तक १४०० एकड़ जब्त की गई जमीन बेच दी गई है और अगर उसका बकाया लगान जल्दी ही न चुकाया गया तो वक्त आने पर ऐसी ५००० एकड़ जमीन और बेच दी जायेगी ।" और फिर बिलकुल नाहक उसमें ये शब्द और जोड़े गये हैं कि " इस तरह बेची हुई जमीन फिर कभी नहीं लौटाई जायेगी।" विज्ञप्तिमें और भी कई दूसरी बातें हैं जिनपर टीका की जा सकती है, मगर मैं जब्त करता हूँ । विज्ञप्तिमें उन लोगोंके लिए कुछ अपमानजनक रियायतोंकी घोषणा की गई है, जो १९ तारीखके पहले अपना कर भर देंगे । स्वाभिमानी पुरुषोंके लिए इसका एक ही जवाब सम्भव है, और वैसा जवाब देना बारडोलीके लोगोंका काम है । जब उन्होंने यह लड़ाई छेड़ी तब वे इसके नतीजे जानते थे । मुझे इसमें जरा भी शक नहीं है कि वे लड़ाईके अन्तिम अंकमें भी वैसी ही वीरता और धीरता दिखलायेंगे, जैसी कि उन्होंने शुरूमें दिखाई थी । १. बेगार में काम करनेवाले मजदूर । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२३
दिखावट