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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२४

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३९२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय एक ओर सरकार की यह विज्ञप्ति है, दूसरी ओर श्रीयुत विट्ठलभाई पटेलने मेरे पास एक खत भेजकर १,०००) रु०की अच्छी खासी रकम, जबतक सत्याग्रह चलता रहे, तबतक मासिक सहायताके रूपमें देते रहनेकी घोषणाकी है। एसेम्बलीके अध्यक्षके रूपमें अपने उज्ज्वल कार्य-कालमें श्रीयुत विट्ठलभाई पटेलने जनताके अधिकारोंकी रक्षाकी है । पद पानेसे उनको थोड़ा भी मद नहीं हुआ है, और ना ही उन्होंने देशकी इज्जतको बट्टा लगाया है। उन्होंने बिलकुल निष्पक्षतासे काम लिया है। और साथ ही जब कभी उन्हें अपने पदपर रहते हुए अवसर मिला है, प्रजाका प्रतिनिधि बनकर काम करनेमें उन्हें न तो झिझक हुई है, और न डर ही लगा है। विदेशी शासकोंने यह गुलामीकी परम्परा स्थापित कर दी है कि जो लोग सरकारसे तनख्वाह पाते हैं, उन्हें किसी भी हालत में सरकारके विरुद्ध लड़ाईमें प्रजाके पक्षके प्रति सहानुभूति प्रकट नहीं करनी चाहिए । यहाँ तक कि सरकार अपने ही बनाये नियमोंके भी विरुद्ध चले, तब भी। श्रीयुत विट्ठलभाई पटेलने इस गुलामीकी बुरी परम्पराको तोड़ दिया है। और वे इस परम्पराको इसलिए तोड़ सके हैं कि उन्होंने अपना पद न तो सम्मानके लिए और ना ही इससे मिलनेवाले वेतन के लिए स्वीकार किया है, बल्कि, जैसा कि वे अपने पत्र में लिखते हैं, निर्वाचकोंकी ओरसे न्यासके रूपमें स्वीकार किया है। यह भी याद रखना चाहिए कि एसेम्बलीका अध्यक्ष बादशाहका सांविधिक नौकर नहीं है। वह तो प्रजाका प्रतिनिधि है और राजनीतिक वाद-विवादोंमें सक्रिय रूपसे शामिल हुए बिना, उसे प्रजाके प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट करनेका पूरा अधिकार है। अध्यक्ष चुन लिये जानेके बाद विट्ठलभाई किसी दल विशेषके आदमी न रहे, मगर उन सभी संयुक्त दलोंके प्रतिनिधि तो अवश्य ही हैं, जिन्होंने उनको अपना अध्यक्ष चुना है । इसलिए उन्होंने प्रजाके पक्षमें जो बहादुरीका काम किया है उसके लिए मैं उन्हें बधाई देता हूँ। अगर विदेशी सरकारकी बनाई विधान सभाओं में जाना किसी तरह भी उचित कहा जा सकता है तो उनमें जानेवालों और पद स्वीकार करनेवालोंके लिए श्रीयुत विट्ठलभाईने रास्ता दिखा दिया है कि वे शालीनता और निर्भयतासे कैसे काम कर सकते हैं। [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, ७-६-१९२८ Gandhi Heritage Portal