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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२५

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४४९. नौ नकद न तेरह उधार अ० भा० चरखा-संघके मन्त्री लिखते हैं : संघकी प्रान्तीय शाखाओंकी कुल उधार-बिक्री रु० १,५४,४८८ - १३ - ८३ तक पहुँची है यानी इन शाखाओंमें कुल जितनी पूँजी लगी है, उसका १५ प्रतिशत तो उधार में लगा हुआ है । और यह भी उधार-बिक्रीकी रोकके लिए कौंसिल के प्रस्तावके बावजूद। इसका मुख्य कारण हमारे कार्यकर्त्ताओंका भय है। उन्हें डर है कि अगर उधार-बिक्री बिलकुल रोक दी जाये तो बिक्री कम हो जायेगी। यह भय निराधार है। तमिलनाडने उधारकी बिक्री बिलकुल बन्द कर दी है, मगर तो भी हिन्दुस्तानभर की सभी खादी दुकानोंमें सबसे ज्यादा बिक्री यहींकी है। आप हमारी विभिन्न शाखाओं और जनताको समझा दीजिए कि पिछले अनुभवसे यह प्रकट होता है कि उधार बिक्रीसे खादीके काममें नुकसान होता है, क्योंकि ग्राहक उधार चुकाने में देर करते हैं और हमारी पूँजी जो पहले ही बहुत ज्यादा नहीं, बन्द पड़ी रहती है । ऊपरके पत्र में दी गई चेतावनीका मैं पूरी तरह समर्थन करता हूँ। जबतक खादीका हमारा यह राष्ट्रीय उद्योग अपनी शैशवावस्थामें है, और इसलिए जबतक उसे जनताकी प्रेमपूर्ण शुश्रूषा और संरक्षणकी जरूरत है, तबतक तो खादी भण्डारोंमें उधार - बिक्री होनी ही नहीं चाहिए। हमें केवल देशभक्त जनता ही के समर्थनका भरोसा रखना चाहिए और अगर हम नकद बिक्री न कर सकें तो हम नकद दाम देनेकी अनिच्छाका यह अर्थ लगा सकते हैं कि जनता खादीको संरक्षण नहीं देना चाहती । किन्तु अपनी अनेकानेक यात्राओंमें मेरा तो यही अनुभव रहा है कि जब लोगोंको खादीकी जरूरत होती है तब वे इसके लिए खुशीसे नकद दाम दे देते हैं, जब कि अपने दूसरे सौदेके लिए उधार करते हैं। जो लोग खादी चाहते हैं, वे उसके लिए नकद दाम दें। यह तो कमसे कम संरक्षण है जिसकी कि खादी हकदार है । बिक्री भण्डारोंके व्यवस्थापकोंको यह भय बिलकुल नहीं होना चाहिए कि उधार बिक्री बन्द कर देनेसे खादी नहीं बिकेगी। खादीकी नकद बिक्री कर सकनेके लिए उन्हें पास-पड़ोस में प्रचार कर सकनेकी अपनी योग्यतापर ही भरोसा रखना चाहिए । और केन्द्रीय कार्यालय आदेशके विरुद्ध तो उन्हें उधार बिक्री किसी हालतमें करनी ही नहीं चाहिए। अनुशासनका तकाजा है कि अगर उन्हें उधार दिये बिना खादी भण्डारोंको चलानेकी अपनी योग्यताका विश्वास न हो तो वे प्रधान कार्यालयको इसकी सूचना दें और कामसे छुट्टी पानेके लिए कहें। प्रधान कार्यालयसे यह आशा की जानी चाहिए कि उसे यह मालूम है कि खादीको कमसे कम समयमें व्यावहारिक रूप किस तरह दिया जा सकता है । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, ७-६-१९२८ Gandhi Heritage Portal