४५०. दक्षिण आफ्रिका के भारतीय दक्षिण आफ्रिकी सर्वोच्च न्यायालयके ट्रान्सवाल प्रान्तीय विभागने अभी हालमें दो बहुत ही महत्वपूर्ण मामलोंमें निर्णय दिया है। इनमें से एक मामला सुरेन्द्र बापूभाई मेढ बनाम प्रवासी अपील बोर्डका था। यह यद्यपि स्वतः महत्वपूर्ण है, किन्तु इसका प्रभाव भारतीयोंके थोड़ेसे उन विशेष मामलोंपर ही पड़ता है, जिनको शिक्षित भारतीयोंकी हैसियत से स्मट्स-गांधी समझौतेके अन्तर्गत छूट मिली थी। संघ सरकारका कहना था कि ये छूटें पूरी नहीं थीं। मुझे इसकी इससे अधिक विस्तृत चर्चा करनेकी आवश्यकता नहीं है। अब न्यायालय इस निर्णयपर पहुँचा है कि अपीलकर्त्ताओं द्वारा प्रस्तुत दृष्टिसे ये छूटें पूरी थी । दूसरा मामला दया पुरुषोत्तम बनाम प्रवासी अपील बोर्डका था। भारतीय प्रवासियोंके लिए इसके परिणाम बहुत दूरगामी हैं । इस मामलेके फैसलेमें कहा गया है कि १९२७ के अधिनियम ३७ का खण्ड ५ पीछेकी तिथिसे लागू नहीं होता। इस कारण जाली तौरपर लिये गये प्रमाणपत्र प्रवासी बोर्ड अथवा प्रवास अधिकारीकी मर्जीके मुताबिक रद नहीं किये जा सकते। यदि यह फैसला कायम रहता है तो वे लोग, जिनके पास ऐसे प्रमाणपत्र हैं, मूलतः दोषी होनेपर भी अप्रभावित रहेंगे । यह प्रवासियोंकी बहुत बड़ी जीत है। मेरी यह इच्छा कदापि नहीं है कि किसी भी तरहकी जालसाजीका समर्थन किया जाये । किन्तु इन प्रवासियोंका मामला मामूली जालसाजीका मामला नहीं है। कई मामलोंमें, कमसे कम १९१४ तक एशियाई दफ्तर एक रिश्वतखोर महकमा था; इस कारण वैध प्रवेशकर्त्ताओंके लिए एशियाई दफ्तरके अधिकारियोंकी लोभवृत्तिकी तृप्तिके लिए टेढ़े तरीके अख्तियार किये बिना प्रवेश पाना लगभग असम्भव था । जहाँ सरकारी अधिकारी जालसाजीमें शामिल हों वहाँ सरकारका असहाय पीड़ितोंको दण्ड देना उचित नहीं है। दक्षिण आफ्रिकी प्रवासियोंसे प्राप्त तारोंसे मुझे पता चला है कि सरकार इन दोनों फैसलोंके खिलाफ अपील कर रही है। मैं संघ सरकारसे नम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि वह भारतीयोंको इन दोनों अपीलोंसे प्राप्त लाभोंसे वंचित न करे । ऐसा करना उसकी समझौतेकी वृत्ति और सद्भावकी नई भावनाके अधिक अनुरूप होगा। पहली अपीलके फैसलेसे सिर्फ थोड़ेसे ही व्यक्तियोंका बचाव होता है। उनके मामलोंमें जालसाजीका कोई सवाल ही नहीं है। दूसरी अपीलके फैसलेसे इस समय संघमें मौजूद काफी लोगोंका बचाव होता है। यदि संघ सरकारने जितने भारतीयोंकी मौजूदगी मानी है, वह उससे कुछ ज्यादा भारतीयोंको खपा लेगी तो इससे उसपर कोई गम्भीर संकट नहीं आ जायेगा। संघ सरकारको यह याद रखना चाहिए कि ये अपीलें खास तौरसे गरीब भारतीयोंके लिए तो बहुत ही खर्चीली पड़ी हैं। एक सुगठित शक्तिशाली सरकारके लिए मुकदमा जीते हुए नागरिकोंको अपील अदालतोंमें घसीटना और उन्हें थका-थका कर उनसे घुटने टिकवाना या उनकी उससे भी खराब Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२६
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