पत्र : कृष्णप्रसादको ३९५ हालत करना मुनासिब नहीं है । दैत्य जैसी शक्ति प्राप्त कर लेना तो ठीक है; किन्तु उसका उपयोग बौनोंके विरुद्ध करना निस्सन्देह बुरा है । I यदि प्रवासी इन अपीलोंमें अपनी जीतपर कोई ज्यादा उम्मीदें न बाँचेंगे तो अच्छा होगा। उन्हें शास्त्री जैसे महान् मित्र और परामर्शदाता मिले हैं। वे अपना मामला उनके सामने पूरे जोरसे रखें; किन्तु उसके बाद वे जो परामर्श दें उसके अनुसार कार्य करें। वे उनकी ओरसे संघ सरकार पर उनका जितना प्रभाव है उस समस्त प्रभावका उपयोग करेंगे। मैं प्रवासियोंके समुद्री तारोंका स्वागत करता उनका मुझपर जो विश्वास है, मैं उसकी मी कद्र करता हूँ । किन्तु मैं सन् १९२०में इतनी दूर और बदली हुई स्थितियोंमें रहता हुआ सहायता करनेकी अपनी सामर्थ्यको बहुत ही सीमित पाता हूँ । इसलिए उनकी शक्ति पारस्परिक एकता, नरम रुख और उस व्यक्तिमें आस्था रखनेपर निर्भर करती है, जो वहाँ भारत सरकारका एजेंट जनरल ही नहीं है, बल्कि उनका सच्चा और सशक्त मित्र और मार्गदर्शक भी है। [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, ७-६-१९२८ ४५१. पत्र : कृष्णप्रसादको सत्याग्रह आश्रम साबरमती प्रिय मित्र, ७ जून, १९२८ बाबू रूपनारायणसे यह सुनकर कि आप खादी आन्दोलन में अत्यधिक दिलचस्पी ले रहे हैं और आपने स्वयं भी कातना शुरू कर दिया है, मुझे प्रसन्नता हुई। मैसूर राज्य द्वारा खादी आन्दोलन किस प्रकार चलाया जा रहा है, इस और मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। मुझे इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि यदि इस आन्दोलनको भली प्रकार चलाया जाये तो निजामकी रियासतके गरीब किसानोंके लिए यह एक वरदान सिद्ध होगा । बाबू रूपनारायणने बताया है कि मैं आपके और आपके बड़े बेटेके सूतका नमूना पानेकी आशा रख सकता हूँ। मैं नमूनोंको पानेकी बाट जोह रहा हूँ । यदि आप मुझे अनुमति देंगे तो ये नमूने हमारे संग्रहालय में रखे जायेंगे, जिसमें प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा काते गये सुतके नमूने इकट्ठे किये जाते हैं। परमश्रेष्ठ महाराजा सर कृष्ण प्रसाद यामिनस्सल्तनत सिटी पैलेस, हैदराबाद, दक्षिण अंग्रेजी (एस० एन० १३६१४) की माइक्रोफिल्मसे । हृदयसे आपका, Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२७
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