४५२. लेस्ली विल्सनको लिखे गये पत्रका मसविदा [७ जून, १९२८] मेरे इस माहकी ४ तारीखके पत्रका उत्तर तत्काल देनेके लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूँ । आपके पत्रसे यह जाहिर है कि हम विरोधी दिशाओंमें काम कर रहे हैं। मेरी समझमें नहीं आता कि चूंकि मेरा जनतामें महत्वपूर्ण पद है इसलिए समान महत्वपूर्ण पदवाले दूसरे व्यक्तिको ऐसा एक मैत्रीपूर्ण पत्र क्यों न लिखूं, जिसमें उसका ध्यान उस बातपर आकृष्ट किया गया हो, जिसे मैं उसके अधिकारियों द्वारा कानून या सरकारी कर्त्तव्यका गम्भीर उल्लंघन समझता हूँ। मैं जो बयान देता हूँ, उनके बारेमें अपने पदके कारण मेरी जो स्थिति बन गयी है उसे ध्यान में रखते हुए मैं प्रमाण नहीं दे सकता, इस तथ्यका यह अभिप्राय नहीं कि मेरे पास ऐसे बयानोंका कोई आधार नहीं है या कि मैं जन-हितको ध्यान में रखते हुए एक साथी अधिकारीको वे बयान गोपनीय रूपमें भी न दूं । यदि आप मेरे ४ तारीखके पत्रको फिरसे पढ़ें तो उससे आपको पता चलेगा कि मैंने यह नहीं कहा है कि मेरे पास प्रमाण नहीं हैं। इसके विपरीत मैंने तो आपको मुझे जो जानकारी मिली है उसके स्रोत बताये हैं। यदि आप उन बयानोंको प्रमाणित करवाना चाहते हैं तो क्या अब यह आपपर ही निर्भर नहीं है कि आप इसका एकमात्र सम्भव तरीका अपनायें अर्थात् जाँच समिति नियुक्त करें ? अन्यथा, आप मुझे बताइये कि मैंने आपको जो बयान दिये हैं, वे सही हैं या गलत, इसके बारेमें आप और किस तरह सन्तुष्ट हो सकते हैं ? आपके पत्रके तीसरे अनुच्छेदके सम्बन्धमें मैं यह कहूँगा कि मेरा आपपर विश्वास न करनेका कोई प्रश्न नहीं है। मैंने आपके पत्रका हवाला यह दिखाने के लिए दिया था कि जिस वक्त आपने मुझे वह पत्र लिखा था उस वक्त आपने कोई जाँच नहीं करवाई थी । स्पष्ट ही आप ऐसा सोचते मालूम होते हैं कि कमिश्नरका पत्र आपत्तिजनक नहीं है, परन्तु मेरी रायमें तो यह पत्र अत्यन्त अपमानजनक है और यह सारे कानूनकी अवज्ञा चाहे न करता हो किन्तु यह सारी व्यवस्था और भद्रताकी अवज्ञा जरूर करता है और सब तरहके शासकीय उत्तरदायित्वसे रहित है। और पिछली १७ तारीखके आपके पत्रके अन्तिम अनुच्छेदसे, जो कि स्पष्ट है, पता चलता है कि उस वक्त जब आपने उसे लिखा था आपने मेरे द्वारा लगाये गये आरोपोंकी कोई जाँच नहीं की थी । जहाँ तक आपके पत्रके चौथे अनुच्छेदका सम्बन्ध है, मैं आपको विश्वास दिला दूं कि मेरा पत्र किसी भी तरह शीघ्रतामें नहीं लिखा गया था। मैंने यह बयान पूर्ण उत्तरदायित्वकी भावनाके साथ सोच-विचार कर दिया था । १. यह अगले शोर्षक के साथ संलग्न था । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४२८
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