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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४३१

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[ पुनश्चः ] पत्र : जे० बी० पेनिग्टनको ३९९ तुम्हारे जितने पत्र मुझे फाड़ने लायक लगे, उन्हें मैंने फाड़ दिया है। तुम सब कुछ यहीं देख लोगे । गुजराती (एस० एन० ११४४७) की फोटो - नकलसे । ४५५ पत्र : जे० बी० पेनिंग्टनको सत्याग्रह आश्रम साबरमती प्रिय मित्र, ८ जून, १९२८ आपका पत्र मिला । मैं जानता हूँ कि हम दोनोंमें चाहे कितने ही मतभेद हों, यदि मैं कभी इंग्लैंड आ सका तो निश्चय ही आप मेरा हृदयसे स्वागत करेंगे । एक मित्रने मुझे लिखा है कि यदि सर जॉन साइमन मुझसे मिलनेकी इच्छा प्रकट करें तो मैं उसे न ठुकराऊँ, क्योंकि वे एक साफ दिलके ईमानदार अंग्रेज हैं, वे कभी कड़ा रुख नहीं अपनाते और वे मेरे मनकी बात जान सकेंगे। यदि उन्होंने ऐसी इच्छा की होती तो मैं आश्रममें निश्चय ही उनका प्रसन्नतासे स्वागत करता । यों मैं [ भेंट करनेको ] इच्छुक नहीं हूँ; क्योंकि मैं अभी तक आयोगमें हूँ । इस कारण मैं उनसे भेंट करनेकी आवश्यकता नहीं समझता। फिर आप पश्चिमी भारतका भूगोल जानते हैं । अहमदाबाद एक तरफ कोनेमें है, अतः मुझे सर जॉन साइमन जैसे व्यक्तिके निश्चित मार्गसे हटकर मुझ जैसे व्यक्तिसे, जो उनके कार्य में किसी प्रकारकी सहायता नहीं कर सकता, मिलने आनेकी आशा नहीं करनी चाहिए । जे० बी० पेनिंग्टन अंग्रेजी (एस० एन० १४३२५) की फोटो नकलसे । । हृदयसे आपका, Gandhi Heritage Portal