४६५. शिक्षा-विषयक प्रश्न २ प्रश्न : वास्तवमें तो आजके शिक्षकोंका काम डाकिये और चौकीदार जैसा है। उनका काम है विद्यार्थियों तक शिक्षा-शास्त्रियोंके लिखे ग्रन्थोंको पहुँचाना और फिर यह देखना कि विद्यार्थी उनका उपयोग ठीक-ठीक कर रहे हैं या नहीं। इसके उपरान्त आप शिक्षकसे कैसी योग्यताकी आशा रखते हैं ? अबतक तो शिक्षा शास्त्रका विकास इसी हदतक किया गया है कि जो कठिन वाक्योंका अर्थ समझा सके, और लम्बे प्रकरणोंका सार बतला सके, वही शिक्षक है । इस आदर्शको हम अब क्यों स्वीकार न करें ? उत्तर : पाठ्य-पुस्तकें चाहे जितनी सरस क्यों न बना दी जायें मगर तो भी सच्चे शिक्षककी जरूरत तो रहती है। ऐसा मुझे लगता है। सच्चा शिक्षक केवल सार बतलाकर या कठिन वाक्योंका अर्थ बतलाकर कभी सन्तोष नहीं मानेगा । वह तो समय-समयपर पाठ्य-पुस्तकोंसे बाहर जाकर अपने सिखलानेका विषय विद्यार्थीके आगे चित्रकारके समान जीवन्तरूपमें खड़ा कर सकेगा । श्रेष्ठ पुस्तकका मिलान किसी श्रेष्ठ चित्रसे किया जा सकता है; मगर जिस प्रकार कुछ कम दर्जेकी कलाका होनेपर भी जिस तरह चित्रकारके कलमसे निकला चित्र फोटोग्राफसे बढ़ा हुआ माना जायेगा, उससे उसमें कुछ विशेषता होगी, उसी तरह सच्चे शिक्षकके बारेमें मानना चाहिए । सच्चा शिक्षक अपने विषय में विद्यार्थीको प्रवेश कराता है । उसमें रस पैदा कराता है, और विद्यार्थीको वह विषय स्वतन्त्र रूपसे समझने लायक बनाता है । मेरी दृष्टिसे तो कठिन वाक्योंका अर्थ करनेवालेको और सार बतलानेवालेको शिक्षक माननेकी प्रथा आदर्श कहीं ही नहीं जा सकती। हमें तो परोपकारकी दृष्टि रखनेवाले सच्चे शिक्षक तैयार करनेका प्रयत्न करना चाहिए। आज भी ऐसा नहीं है कि जहाँ-तहाँ ऐसे शिक्षक देखनेमें न आते हों । प्रश्न : भड़ौंच शिक्षा परिषद् के अवसरपर आपने कहा था कि प्राथमिक शिक्षा मुफ्त भले ही हो किन्तु अनिवार्य नहीं होनी चाहिए। अच्छी वस्तु भी दबाई हुई प्रजापर जबरदस्ती नहीं लादी जानी चाहिए। आज देशकी शिक्षाकी व्यवस्था आपके हाथमें आ जाये तो क्या आप अपनी यह शिक्षा जिसमें खादी और दूसरे राष्ट्रीय उद्योगों को प्रधान स्थान होगा, अनिवार्य करेंगे या नहीं ? उत्तर : मैंने जैसी शिक्षाकी कल्पना की है वह शिक्षा भी अनिवार्य बना देनेकी हिम्मत मुझे अब भी अपने आपमें दिखाई नहीं देती। मैं मानता हूँ कि हमारे देशमें अभी बहुत दिनों तक इसकी बिलकुल जरूरत नहीं है। क्योंकि प्राथमिक शिक्षा आवश्यक हो, तो भी उसे ऐसा करनेसे पहले अभी बहुतसे काम करने बाकी हैं। मेरी मान्यता तो यह है कि यदि हम इस देशको रुचने लायक, प्रजाकी पोषिका शिक्षा देनेका साधन प्रजाके सामने रखें तो प्रजा उसे बिना प्रयास ही खुशी से स्वीकार कर लेगी। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४३७
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