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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४३९

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बारडोली यज्ञ ४०७ सरकारी नौकरी करनेवालेको लोगोंको लूटनेका जो अवसर मिलता है, उसे अच्छा मौका समझनेके बदले एक बुरी बात समझकर उससे दूर रहना सीखें, तो सरकारके हाथ-पैर ढीले पड़ जायें। हमारे ही आदमी सरकारके हाथ और पैर हैं । वे हट जायें तो सरकारकी तोप और बन्दूक तथा हवाई जहाज सभी निरर्थक हो जायें । सरकारकी विज्ञप्ति में असत्य, अविनय और प्रजा पक्षका तिरस्कार भरा है । उसमें सरकारने जो लालच दिखलाया है, मैं आशा करता हूँ कि उसमें बारडोलीका कोई किसान नहीं फँसेगा । सरकारने साम, दाम, दण्ड और भेदका पूरा उपयोग किया है, और अभी कर रही है। इसमें दण्ड तो कमसे कम दूषित वस्तु है । दण्डको हम पहचान सकते हैं । उसे सहन कर लें, तो उसके भयसे उबर गये । साम, दाम और भेद सूक्ष्म वस्तुएँ हैं । उसमें प्रलोभन हैं। इसलिए जिस तरह मछली काँटेपर लगी आटेकी गोलीको चाटने जाकर उसमें फँस जाती है, उसी तरह इस जहरीली त्रिवेणीमें भोले और भीरु लोग फँस जाते हैं । उन्नीस जूनके पहले लगान भरनेवालेको जिस सुभीतेका लालच दिया गया है, वह दाम-नीति है । उस घूसके मधुमें मक्खीके समान फँसकर एक भी किसान अपनी प्रतिज्ञा न तोड़ेगा, ऐसी आशा रखनेका प्रजाको अधिकार है। सारे भारतवर्षपर बारडोलीने जिस निडरता और सहन- शीलताकी जो छाप डाली है, उसे वह कभी नष्ट न होने दे । भेदनीति दामनीतिसे भी गई बीती है | अनेक तरहकी अफवाहें सुननेमें आ रही हैं। कोई कहता है कि सरकार समझौता करना चाहती है; कोई कहता है लोग कमजोर पड़ गए हैं, कोई कहता है कि लोग चुपचाप जा-जाकर चोरी से लगान भरने लगे हैं; कोई कहता है कि बहिष्कारका भय न हो तो लोग लगान भरनेको तैयार हैं, कोई कहता है कि बाहर से आये हुए श्री वल्लभभाई और उनके साथियोंके डरके कारण लोग लगान नहीं चुका रहे हैं, नहीं तो बेचारे किसान लगान देकर शान्तिसे बैठ जाना चाहते हैं। यह सब भेदनीति है। मेरे कहनेका यह आशय भी नहीं है कि ऐसा कहनेकी प्रेरणा कोई खास आदमी देता है, किन्तु जिस शासन में ऊपर बतलाई चार नीतियोंको स्थान मिला है, वहाँ वह इनके जरिये काम किया करता है। सारा नौकर वर्ग समझता है कि सरकारी नीतिके अनुकूल बननेमें ही हमारे वेतन और ओहदेकी वृद्धि छिपी हुई है। भीष्म द्रोणादिको भी धर्मराजके आगे अपना पेट दिखलाना पड़ा था । इसलिए जैसे-जैसे लड़ाई जमती जायेगी, भेदनीतिमें वृद्धि होती जायेगी, इस मोहजालसे सभी सत्याग्रही दूर भागें । एक भी अफवाह न मानें। जो कुछ सुनें, सरदारके पास पेश करके खुद उसे भूल जायें। सत्याग्रहीका समाधान एक ही होता है । जहाँ उसकी प्रतिज्ञाका पालन पूरा हुआ, वहाँ उसका काम समाप्त हो गया । वह अधिक न माँगे और कमसे सन्तोष न करे। उसने तो अपनी प्रतिज्ञाकी वेदीपर प्यारीसे-प्यारी वस्तुको होम करनेका निश्चय कर लिया है। ऐसे आदमीका अफवाहोंसे क्या सम्बन्ध ? फिर जो अपने माने हुए सरदारको पराया बनानेका औद्धत्य दिखायें, Gandhi Heritage Portal