सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४४१

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

४६८. गोविन्द बड़े या गुरु ? ऊपरके शीर्षकसे एक गृहस्थने यह लेख भेजा है : लेखकने मारवाड़ी भक्तके बारेमें जो लिखा है, वह मैं नहीं जानता । लेखकने 'सिद्धान्त रहस्य २ नामक पुस्तकमें से जिन तीन श्लोकोंका अर्थ भेजा है, वे श्लोक मी मैंने नहीं देखे हैं । किन्तु इस लेखमें जो लिखा है, वैसी मान्यता हिन्दू-धर्ममें है इस विषय में शंका नहीं है। मैं स्वयं नित्य प्रातःकाल नीचेके श्लोकका पाठ करता हूँ : गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ।। और यह भी मानता हूँ कि गुरुके माहात्म्यके बारेमें हिन्दू धर्मकी मान्यताके लिए सबल कारण होंगे, इसीलिए गुरु शब्दका शुद्ध अर्थ ढूंढ़ रहा हूँ। और जब-तब कहता हूँ कि मैं गुरुकी खोजमें हूँ। जिस गुरुमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरका लय हो, और जो साक्षात् परब्रह्म सम हो, वह देहधारी, विकारी और रोगी मनुष्य नहीं होगा, किन्तु उसमें तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरकी सारी शक्ति होगी, यानी वह आदमी मुख्यतया हमारी कल्पनामें ही होगा। और वह गुरु, इष्टदेव केवल सत्यकी मूर्ति परमात्मा ही होगा । इसलिए गुरुकी खोज परमात्माकी खोजके बराबर हुई। यह विचार करते हुए जो-जो वस्तुएँ लेखकने लिखी हैं, वे सरल हो जाती हैं। जो गोविन्दको बता सके वह अवश्य ही गुरु होने लायक है और चाहे वह पीछे भले ही गोविन्दसे भी बड़ा गिना जाये । गोविन्दके बनाये जीवोंको अनेकों दुःख भोगते हुए हम देखते हैं, किन्तु हमें जो इस फन्देसे छुड़ा सके वह खुशी से गोविन्दसे भी बड़ा पद ले सकता है। यही आशय 'रामसे अधिक राम कर दासा 'में है । इन सभी महावचनोंका अर्थ इतना स्पष्ट है कि अगर हम सरल हृदयसे ढूंढे तो न किसी प्रपंच में पड़ें न अनर्थ में । हरएक महावचनमें यह अनिवार्य शर्त जुड़ी हुई होती ही है । जो हमें प्रेमधर्म । सिखलाये, जो हमें भयमुक्त करे, सादगी सिखलाये, गरीब से गरीबके साथ भी ऐक्य साधनेकी बुद्धि ही नहीं बल्कि ऐक्यका अनुभव करनेका हृदयबल भी दे, वह हमारे लिए अवश्य ईश्वरसे भी बड़ा है। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि ईश्वरका ऐसा दास अलग और स्वतन्त्र रूपमें ईश्वरसे बड़ा है । हम समुद्रमें जा पड़ें तो डूब जायेंगे, मगर इसी समुद्रकी ओर बहनेवाली गंगाके मूलसे एक लोटा जल प्यास लगने पर लेकर पी लें तो उस समय यह गंगाजल हमारे लिए समुद्र से भी बड़ा है । किन्तु यही गंगाजल वहाँसे लेने जायें जहाँ समुद्र में गंगा मिलती है तो वह जहरके समान १. लेख यहाँ नहीं दिया जा रहा है। लेखकने गांधीजीके इस कथनका समर्थन किया था कि जीवित मनुष्योंका पूजन नहीं करना चाहिए। (देखिए “भक्तिके नामपर भोग ", ६-५-१९२८ ) । किन्तु साथ ही उनका ध्यान गुरुके माहात्म्यको ओर खींचा था। २. वल्लभाचार्य कृत । Gandhi Heritage Portal