४१० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय हो जाता है। ऐसा ही गुरुके विषयमें समझना चाहिए। जिनमें दंभ है, ईर्ष्या है जो सेवाके भूखे हैं, उन्हें गुरु मान बैठना तो अनेक प्रकारके गन्दे पानीको समुद्र में ले जा रही गंगा नदीके जहरीले पानीके समान समझना चाहिए। अभी तो हम धर्मके नामपर अधर्मका आचरण करते हैं। सत्यके नामपर पाखण्डका पोषण करते हैं और ज्ञानी होनेका ढोंग करके अनेक प्रकारकी पूजा स्वीकार करके आप अधोगतिको प्राप्त होते हैं और साथ में दूसरोंको भी ले डूबते हैं। ऐसे समयमें किसीको गुरु बनानेके बारेमें बिलकुल इनकार करना ही धर्म है। सच्चा गुरु न मिले तो मिट्टीके पुतलेको गुरु बना लेनेमें दुहरा पाप है। किन्तु जबतक सच्चा गुरु न मिले, तबतक 'नेति नेति' कहनेमें पुण्य है। इतना ही नहीं, उससे किसी दिन सच्चे गुरुके मिलनेका भी प्रसंग आ सकता है। इसके मुझे बहुतसे कड़वे मीठे अनुभव हुए हैं और अब भी हुआ करते हैं कि चलती धाराका विरोध करनेमें बहुत-सी मुसीबतें रहती हैं। किन्तु उनसे मैंने एक बात यह सीखी है कि जिस वस्तुमें अनीति है, जिसका खण्डन होना ही चाहिए उसका विरोध एकाकी होनेपर भी हमें करना ही चाहिए और यदि हमारा यह विरोध सच्चा है तो जरूर सफल होगा। ऐसा विश्वास सदैव रखना उचित है। जो भक्त स्तुतिका या पूजाका भूखा है, जो मान न मिलनेसे चिढ़ जाता है, वह भक्त नहीं है । भक्तकी सच्ची सेवा स्वयं भक्त बननेमें हैं । इसलिए आजकल चलनेवाली मनुष्य-पूजाका जहाँतक हो सकता है मैं विरोध ही करता हूँ और सबको विरोध करनेके लिए प्रेरित करता हूँ । [ गुजरातीसे ] नवजीवन १०-६-१९२८ ४६९. संयमकी आवश्यकता किसे ? विवाद करनेके इच्छुक एक भाई लिखते हैं: " यह मेरा अनुभव है कि जिस संयमको दूसरेकी सहमतिकी आवश्यकता हो वह संयम टिक नहीं सकता। संयमको अन्तर्नादकी ही जरूरत होती है। संयमका आधार हृदयबल है और जो संयम ज्ञानमय और प्रेममय होता है, उसकी छाप आसपासके वातावरणपर पड़े बिना नहीं रह सकती । अन्तमें विरोध करनेवाला भी अनुकूल बन जाता है। पति-पत्नीके बारेमें भी यही बात है। अगर जबतक पत्नी तैयार न हो, तबतक पति रुके और जबतक पति तैयार न हो, तबतक पत्नी, तो बहुत करके दोनों ही भोग-पाशसे नहीं छूट सकेंगे। बहुतसे उदाहरणोंमें देखा गया है कि जहाँ संयमके लिए एक दूसरे पर निर्भर रहा जाता है, वहाँ अन्तमें वह संयम टूट जाता है । यह १. पत्र यहाँ नहीं दिया जा रहा है। लेखकने पूछा था कि संयम पालनके लिए क्या पत्नीकी सहमतिकी जरूरत नहीं है। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४४२
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