४७५. भाषण : गुजरात विद्यापीठके विद्यार्थियोंके समक्ष ११ जून, १९२८ इस समय आप विद्यार्थीगण शायद मन ही मन उदास हैं । आपकी यह त्रिशंकु जैसी स्थिति टल जाये इस कारण आपने मुझे यहां आकर रहनेको आमन्त्रित किया था । कारण कोई और हो तो भी आपकी यह दशा हलकी करने या टालनेके लिए ही मैंने यह निमन्त्रण स्वीकार किया था । किन्तु यह निमन्त्रण भेजनेवाले सभी या उनमें से अधिकांश कायर निकले। उन्होंने मुझे बुलानेके बाद मुझे बाहर निकाल दिया । बादमें फिर बुलानेपर ऐसी शर्तें रखीं जिन्हें मेरे जैसा मानी स्वीकार नहीं कर सकता था । ऐसा करके आपने निकट आनेका सुअवसर हाथसे निकल जाने दिया, किन्तु हम अलग नहीं हुए । विद्यापीठके आदर्शोंके माध्यमसे आपके और मेरे बीच एक सम्बन्ध बना हुआ है। मैं चाहता था कि इन आदर्शको आप अच्छी तरह आत्मसात कर लें। किन्तु तब यह काम सिद्ध नहीं हुआ । - इस अवकाशमें आपने विद्यापीठके ध्येय पढ़े होंगे, उनपर विचार किया होगा । यदि आपने उनका मनन किया होगा तो कितनी वस्तुएँ आपकी समझमें आ गई होंगी । छुट्टीका उपयोग अगर आपने इस तरह न किया हो तो फिर आप जैसे गये थे वैसे ही आये हैं। मैंने तो महाविद्यालय में कई बार कहा है कि संख्याबलकी जरा भी परवाह न की जाये। मैं यह कहना नहीं चाहता कि अगर संख्याबल हो तो यह हमें अप्रिय होगा। किन्तु वह न हो तो हम निराश न हों। ऐसा न मान लें कि हमने सब खो दिया, बाजी हाथसे जाती रही । हम संख्यामें कम हों अथवा अधिक, हमारा असली बल तो सिद्धान्तोंको स्वीकार करनेमें और मनुष्यकी शक्तिके अनुसार उनका पालन करनेमें है । ऐसे विद्यार्थी कमसे कम हों, तो भी हमें विद्यापीठसे जो काम लेना है, और वह काम मुक्ति है -- अन्तिम मुक्ति नहीं, स्वराज्य रूपी मुक्ति विद्यापीठ जिस स्वराज्यके लिए स्थापित हुआ है, वह उसे जरूर प्राप्त हो जायेगा । अगर हम झूठे होंगे तब तो स्वराज्य मिलनेसे रहा । अभी हालमें जो फेरफार हुए हैं और अब आप जिन्हें देखेंगे, वे तो हम इस तरह डरते-डरते कर सके हैं कि वे कहीं आपकी शक्तिके बाहर न हो जायें । यह कैसी दयनीय स्थिति है। इसमें न तो आपकी शोभा है न हमारी । होना तो यह चाहिए कि आप अपने अध्यापकों और संचालकोंको यह अभयदान दे दें कि हम इन सिद्धान्तोंके पालनमें जरा भी कच्चापन न रखेंगे। यह अभयदान नहीं है । मैं उसकी याचना करने आया हूँ । सत्रके आरम्भ से ही आप अध्यापक वर्गको निश्चिन्त कर दें तभी काम चमक उठेगा। आपके काममें असत्यका जरा भी स्पर्श नहीं होना चाहिए। आप विद्यापीठको तभी शोभित कर सकेंगे जब आप अपने ही मनको, अध्यापकोंको, गुरुजनोंको और भारतवर्षको धोखा नहीं देंगे। आप अध्यापकोंसे हरएक बातका खुलासा माँग सकते हैं। आपकी हरएक । Gandhi Heritage Portal
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