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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४४८

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४१६ I सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय कठिनाईको सुलझाना उनका धर्म है। यह न करके अगर आप जैसे-तैसे यहाँ बैठे रहें तो विद्यापीठकी व्यवस्थामें संगति नहीं आयेगी । विद्यापीठका काम इतनी अच्छी तरह चलना चाहिए कि वह संगीतके समान लगे। तंबूरेके पीछेका संगीत तो स्थूल है। सच्चा संगीत तो सुजीवन है, जिसका जीवन सुजीवन है, वही सच्चा संगीत जानता है । यह जीवन संगीत बालक भी जानता है, अगर माँ-बापने उसे ठीक रास्ते चलाया हो तो । बालकके पास वाणी केवल रोना ही है; मगर होनहार बालकको वह भी शोभा देता है । विद्यार्थियोंमें बच्चोंके ही समान माधुर्य होना चाहिए। अगर आप सत्यका आचरण करें तो सहज ही यह स्थिति लाई जा सकती है। विद्यार्थी अगर सत्यका आचरण करनेवाले हों तो उनके द्वारा हिन्दुस्तानका स्वराज्य प्राप्त किया जा सकता है। यह बात विद्यापीठके सिद्धान्तमें ही है कि अहिंसा और सत्यके ही रास्ते हमें स्वराज्य लेना है, इसलिए इसे सिद्ध करना भी नहीं रह जाता है। जिसे इसमें शंका हो, उसके लिए यहाँ स्थान नहीं है। अथवा जिसे इसमें कोई शंका हो, उसे प्रारम्भमें ही उसका निवारण कर लेना चाहिए । | सरकारी शाला और हमारी शालाका भेद समझना चाहिए। हमारे कई विद्यार्थी जेल गये और कई अभी जायेंगे। वे विद्यापीठके भूषण हैं। क्या सरकारी शालाओंके विद्यार्थियोंकी भी मजाल है कि वे वल्लभभाईकी मदद कर सकें ? अथवा मदद करनेके बाद अपने शिक्षकको धोखा दिये बिना कालेजमें रह सकें? पीछे उन्हें चाहे जितना ज्ञान मिलता रहे, मगर वह किस कामका ? सत्व हर लेनेके बाद ज्ञान दिया हो तो क्या हुआ ? खोटे सिक्केकी क्या कीमत, उसे काममें लानेवाला धोखेबाज तो सजाका पात्र होता है। सरकारी शालाओंके विद्यार्थियोंकी खोटे रुपयेके समान बुरी स्थिति है। हमारे यहाँ सत्व तो कायम है ही, और इतना ही नहीं बल्कि उसमें वृद्धि होनी है। एक और भेद ध्यानमें रखना चाहिए। मैं कई बार बता चुका हूँ कि सरकारी कालेजकी शिक्षाके साथ तुम्हारी शिक्षाका मुकाबला नहीं हो सकता । इस जंजाल में पड़ोगे तो मारे जाओगे। उसकी हम बराबरी नहीं कर सकेंगे। अंग्रेजी जिस ढंगसे वहाँ सिखाई जाती है, उस ढंगसे हमें नहीं सिखानी है । पर साहित्यका जो सूक्ष्म ज्ञान है, वह हमें गुजराती जबानके जरिये देना है। जिससे गुजराती भाषाका विस्तार हो, उसकी शोभा बढ़े, उसमें गहरे से गहरे विचार प्रकट हो सकें, वह काम करना है। गुजराती बोलते वक्त बीच-बीचमें अंग्रेजीके शब्द या वाक्य काममें लाने पड़ें, यह खराब और निहायत शर्मंकी बात है। दुनियाके और किसी मुल्ककी ऐसी हालत नहीं है । अंग्रेजी साहित्यकी जितनी जानकारी जरूरी होगी, वह आगे चलकर ऊपरके दर्जेमें दी जायेगी। अभी तो जो ज्ञान लेंगे वह गुजरातीके जरिये ही लेंगे। विज्ञान भी अपनी भाषामें ही सीखेंगे। पारिभाषिक शब्द नये नहीं बना सकेंगे तो अंग्रेजी शब्द लेंगे, पर उनकी व्याख्या तो गुजरातीमें ही करेंगे। इससे हमारी भाषा जोरदार बनेगी। जो अलंकार हमें इस्तेमाल करने होंगे, वे हमारी जबान और कलमपर चढ़ जायेंगे । अभीकी बेहूदा हालतसे जितनी जल्दी निकला जा सके, उतनी जल्दी निकल जाना चाहिए। इस बारेमें मैंने 'नवजीवन' में जो कुछ लिखा है, उसे वेदवाक्य समझना । Gandhi-Heritage Portal