४१८ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय आपको अपना विश्वास, धीरज और उद्यम नहीं खोना चाहिए। अध्यापकों और सिद्धान्तों पर भरोसा होगा तो आप नहीं डरेंगे । तादाद थोड़ी होगी, तो भी नहीं डरेंगे और विद्यापीठकी शोभा बढ़ायेंगे । अध्यापकोंको पूरा-पूरा देनेके लिए मजबूर करेंगे। आप पढ़नेवाले होंगे तो मैंने जो कुछ कहा है, उसमें से भी सवाल पूछ-पूछ कर अध्यापकोंको तंग कर सकेंगे। पूरी दिलचस्पीके साथ काम करेंगे, तो रसके घंट तो यहीं मिलेंगे । आपके शरीर तेजस्वी होंगे, मन तेजस्वी होगा और आत्मा भी तेजस्वी होगी । यहाँ जो आप आते हैं, तो आत्माको तेजस्वी बनाने के लिए ही । इसलिए जिस उद्योगकी शिक्षा रखी गई है उसमें दिलचस्पी लेकर काम करेंगे, तो आपमें उद्योग- बुद्धि न होने पर भी वह जाग उठेगी । लेकिन अगर जड़की तरह रहकर रंदा लगायेंगे, तो यह नहीं हो सकेगा। दिलचस्पी लेंगे तो देखेंगे कि यह भी एक शास्त्र है । जाग्रत रहकर उद्योग करेंगे तो देखेंगे कि इसमें बहुत रस है और यह साबित कर सकेंगे कि इसका भी शास्त्र है । यह निश्चय करना है कि मुझे जुलाहा बनना है, बढ़ई बनना है और हिन्दुस्तानको स्वराज्य दिलाना है; नौकरी नहीं करनी है, मुंशी नहीं बनना है । यह निश्चय रखना है कि मजदूरी करके, खादी बुनकर, खादी सेवक बनकर गुजारा करना है । [ गुजराती से ] नवजीवन, १७-६-१९२८ ४७६. पत्र : प्रेमलीला ठाकरसीको ११ जून, १९२८ प्रिय बहन, तुम्हारी तरफसे रु० १०० तो दो दिन पहले मिल गये थे । पत्र आज ही मिला है। तुम्हारा नाम प्रकट न हो अगर ऐसा अब भी हो सका तो करेंगे । यह तभी सम्भव है यदि वह अभी तक छपा न हो । मेरा स्वास्थ्य ठीक रहता है। फिर कब आओगी ? गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ४८१२) की फोटो नकलसे । सौजन्य : प्रेमलीला ठाकरसी मोहनदास के वन्देमातरम् Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४५०
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