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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४५२

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४२० सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय साथियोंका हाथ है। इसमें कोई फेरफार होने तक फिलहाल इसे स्वीकृत नियमावली माननेका प्रस्ताव कार्यवाहक मण्डलने स्वीकार कर लिया है। किन्तु अभी तो यह नियमावली कच्चे मसविदेके तौर पर ही छापी जा रही है । आश्रमका हित चाहने- वाले, और नैतिक दृष्टिसे आश्रमको बढ़ते हुए देखना चाहनेवाले बहुत लोग हैं । नियमावलीके बारेमें उनका भी मत जानना, इसे छापनेका उद्देश्य है । इसलिए आश्रमके साथ सम्बन्ध रखनेवाले, न रखनेवाले, मित्रों और टीकाकार आलोचकों, सबसे इसमें सुधार करनेके बारेमें अपनी सलाह भेजनेकी प्रार्थना में करता हूँ। मैं मानता हूँ कि आश्रमका प्रयोग शास्त्रीय पद्धति से चलता है। यानी जो नियम बनाये गये हैं उनसे आजका आश्रम-जीवन सूचित होता है । उसका अर्थ ऐसा नहीं है कि उनमें दिये गये व्रतोंका सर्वांश में पालन करनेवाला एक भी आश्रमवासी है, मगर उसका अर्थ यह अवश्य है कि प्रत्येक आश्रमवासी इन नियमोंका पालन करनेका सतत् प्रयत्न किया ही करता है और १३ वर्षोंके अनुभवके बाद उनका पालन आवश्यक लगा है और इनका थोड़े-बहुत अंशोंमें पालन हो भी सका है। । स्थापना कोचरव (अहमदाबाद) में वैशाख सुदी ११, सं० १९७१ तदनुसार २५वीं मई सन् १९१५; अब साबरमती में । उद्देश्य जगतके हितसे अविरोध रखनेवाली देशसेवा करनेकी शिक्षा लेना और ऐसी देशसेवा करनेका सतत् प्रयत्न करना इस आश्रमके उद्देश्य हैं। नियम नियम : इन उद्देश्योंकी पूर्ति के लिए नीचेके नियमोंका पालन आवश्यक है : १. सत्य सामान्य व्यवहार में असत्य न बोलना या उसका आचरण न करना ही सत्यका अर्थ नहीं है। किन्तु सत्य ही परमेश्वर है और उसके अलावा और कुछ नहीं है । दूसरे सभी नियमोंकी आवश्यकता इस सत्यकी खोज और साधनाके लिए ही पड़ती है और उसीमें से उसकी उत्पत्ति है। इस सत्यका उपासक अपने कल्पित देशहित के लिए भी असत्य नहीं बोलता, असत्यका आचरण नहीं करता । सत्यके लिए प्रह्लादके समान माता-पितादि गुरुजनोंकी आज्ञाका भी विनयपूर्वक मंग करने में धर्म समझता है । २. अहिंसा प्राणियोंका वध न करना ही इस व्रतके पालनके लिए बस नहीं है। अहिंसा अर्थात् सूक्ष्म जीवोंसे लेकर मनुष्य तक सभी प्राणियोंके प्रति समभाव रखना । इस व्रतका पालक घोर अन्याय करनेवालेके प्रति भी क्रोध नहीं करता किन्तु उसके प्रति प्रेमभाव रखता है, उसका हित चाहता और करता है। किन्तु प्रेम करते हुए भी अन्यायी के अन्यायका अंकुश नहीं मानता, बल्कि अन्यायका विरोध करता है, और वैसा करनेमें जो कष्ट हों, उन्हें वैर्यपूर्वक और द्वेष किये बिना अन्यायको सहता है । Gandhi Heritage Portal