ब्रह्मचर्य का पालन किये बिना ऊपरके व्रतोंका पालन करना असम्भव है। ब्रह्मचारी किसी स्त्री या पुरुष पर कुदृष्टि न डाले, केवल इतना ही बस नहीं, किन्तु वह मनसे भी विषयोंका चिन्तन या सेवन न करे। और यदि वह विवाहित हो तो अपनी पत्नी या अपने पतिके साथ भी विषयभोग न करे, किन्तु उसे मित्र समझकर उसके साथ निर्मल सम्बन्ध रखे। अपनी पत्नी या दूसरी स्त्रीका अथवा अपने पति या दूसरे पुरुषका विकारमय स्पर्श या उसके साथ विकारमय भाषण या अन्य विकारमय चेष्टा भी स्थूल ब्रह्मचर्यका भंग है।
ऐसा अनुभव होनेसे कि मनुष्य जबतक जीभके रसोंको नहीं जीतता, तबतक ब्रह्मचर्य का पालन अति कठिन है, अस्वादको अलग व्रत गिना गया है। भोजन केवल शरीरयात्राके लिए ही हो, भोगके लिए कभी नहीं। इसलिए उसे औषध समझकर संयमपूर्वक भोजन करनेकी जरूरत है। इस व्रतका पालन करनेवाला ऐसे मसालों वगैराका त्याग करेगा जो विकार उत्पन्न करते हैं। मांसाहार, मद्यपान, तम्बाकू, भाँग इत्यादिका सेवन करना आश्रम में निषिद्ध है। इस व्रतमें स्वादके लिए उत्सव या भोजनके आग्रहका निषेध है।
इस व्रतके पालनके लिए यही काफी नहीं है कि दूसरेकी वस्तु उसकी अनुमतिके बिना न ली जाये। जो वस्तु जिस उपयोगके लिए हमें मिली हो, उसके अलावा उसका अन्य किसी प्रकारसे उपयोग करना या जितने समय के लिए मिली हो उससे अधिक समय तक उसका उपयोग करना भी चोरी है। इस व्रतके मूलमें सूक्ष्म सत्य तो यह छिपा हुआ है कि परमात्मा प्राणियोंकी नित्यकी आवश्यक वस्तुएँ ही नित्य उत्पन्न करता और देता है। उससे तनिक भी अधिक पैदा नहीं करता। इसलिए अपनी कमसे कम आवश्यकतासे अधिक जो कुछ भी मनुष्य लेता है वह चोरी करता है।
अपरिग्रह अस्तेयके अन्तर्गत ही है। जिस तरह अनावश्यक वस्तु नहीं ली जा सकती, उसी तरह उसका संग्रह भी नहीं किया जा सकता। इसलिए जिस खूराक या साज-सामानकी जरूरत न हो, उसका संग्रह करना इस व्रतका भंग है। जिसका काम कुर्सीके बिना चल जाये वह कुर्सी न रखे; अपरिग्रही दिनोंदिन अपने जीवनको और भी सादा बनाता जाये।
अस्तेय और अपरिग्रहके पालनके लिए स्वयं काम करनेका नियम जरूरी है। फिर मनुष्य मात्र शारीरिक श्रमसे शरीर-निर्वाह करें तभी वे सामाजिक और आत्म-द्रोहसे बच सकते हैं। जिनका शरीर चल सकता है और जिन्हें समझ आ गई है,