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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४५४

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४२२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय उन स्त्री-पुरुषोंको अपने नित्यका सारा काम, जो वे आप कर सकते हों, कर लेना चाहिए और बिना कारण दूसरेकी सेवा नहीं लेनी चाहिए। किन्तु बालकों, अन्य अपंग लोगों और वृद्ध स्त्री-पुरुषोंकी सेवा करनेका अवसर मिले तो उनकी सेवा करना सामाजिक जिम्मेदारीको समझनेवाले प्रत्येक मनुष्यका धर्म है । इस आदर्शका अवलम्बन करके आश्रम में मजदूर वहीं रखे जाते हैं, जहाँ वे अनिवार्य हों, और उनके साथ मालिक नौकरका व्यवहार नहीं किया जाता । ८. स्वदेशी मनुष्य सर्वशक्तिमान् प्राणी नहीं है । इसलिए वह अपने पड़ोसीकी सेवा करके जगतकी सेवा करता है । इस भावनाका नाम स्वदेशी है। जो अपने नजदीकके लोगोंकी सेवा छोड़कर दूरवालोंकी सेवा करने या लेनेको दौड़ता है, वह स्वदेशीका भंग करता है । इस भावनाके पोषणसे संसार सुव्यवस्थित रह सकता है। उसके भंगसे अव्यवस्था होगी। इस नियमके आधार पर, जहाँतक बने, हम अपने पड़ोसकी दुकानसे व्यवहार रखें, देशमें जो वस्तु बनती हो या सहज ही बन सकती हो, वह विदेशसे न मँगायें । स्वदेशीमें स्वार्थके लिए स्थान नहीं है। कुटुम्बके लिए अपने-आपको, शहरके लिए कुटुम्बको, देशके लिए शहरको, और जगत्के कल्याणार्थं देशको होम कर दिया जाये । ९. अभय सत्य, अहिंसा आदि व्रतोंका पालन निर्भयताके बिना असम्भव है। और फिलहाल जहाँ सर्वत्र भय व्याप रहा है, वहाँ निर्भयताका चिन्तन और उसकी शिक्षा अत्यन्त आवश्यक होनेसे, उसे व्रतोंमें स्थान दिया गया है। जो सत्यपरायण रहना चाहता है, वह न जात-बिरादरीसे डरता है, न सरकारसे डरता है, न चोरसे डरता है, न गरीबी से डरता है और न मौतसे डरता है । १०. अस्पृश्यता निवारण हिन्दू धर्म में अस्पृश्यताकी रूढ़िने जड़ जमा ली है । यह धर्म नहीं, अधर्म है। हमारी ऐसी मान्यता होनेके कारण अस्पृश्यता निवारणको नियमावलीमें स्थान दिया गया है । आश्रममें अस्पृश्य माने जानेवाले लोगोंके लिए दूसरी जातियोंके बराबर ही स्थान है । आश्रम जाति-भेद नहीं मानता। वह ऐसा मानता है कि जाति-भेदसे हिन्दू-धर्मको नुकसान हुआ है । उसमें छिपी हुई ऊँच-नीच और छुआछूतकी भावना अहिंसा-धर्मकी घातक है । आश्रम वर्णाश्रम धर्मको मानता है । वर्णाश्रम धर्मकी वर्ण-व्यवस्था केवल धन्धोंके आधारपर जान पड़ती है। इसलिए वर्ण नीतिका पालन करनेवाला ऐसे धन्धेसे, जो माँ-बापके धन्धेका अविरोधी हो, अपनी आजीविका पैदा करे और बाकी समय शुद्ध ज्ञान लेनेमें और बढ़ानेमें लगाये । स्मृतियोंमें दी गई वर्ण-व्यवस्था जगतका हित करनेवाली है, किन्तु वर्णाश्रम धर्म मान्य होने पर भी आश्रम-जीवन 'गीता' मान्य व्यापक और भावना प्रधान संन्यासको आगे रखकर रचा गया है, इसलिए आश्रम में वर्णभेदको अवकाश नहीं है । Gandhi Heritage Portal