४८१. अ० भा० चरखा संघकी सदस्यता अ० मा० चरखा संघके तकनीकी विभागके निदेशकने मुझे निम्नलिखित तुलनात्मक तालिका मेजी है । इस तालिकाका अध्ययन करने पर बहुत-सी बातें मालूम होती हैं । जहाँ खादीका ब्यावसायिक विभाग धीरे ही सही, मगर निश्चित रूपसे खादीकी किस्म, मिकदार और कीमतमें दिनों-दिन उन्नति करता जा रहा है, और वैतनिक कतैयोंकी संख्या भी बढ़ती जा रही है, वहाँ बिहार और अजमेरको छोड़कर और सब जगह यज्ञार्थ सूतका कातना बराबर घटता ही जा रहा है । इससे या तो यह पता चलता है कि हमें यह पक्का विश्वास ही नहीं रहा कि हाथकताईमें हमारे करोड़ों लोगोंकी दशा सुधारने और मध्यम वर्गके लोगोंका सामान्य जनताके साथ लाभकारक सम्बन्ध जोड़नेकी शक्ति है या फिर मध्यम श्रेणीके लोगोंमें यह विश्वास तो है, मगर वे इतने आलसी या लापरवाह हो गये हैं कि उनसे जिस स्वल्प, किन्तु सतत त्यागकी अपेक्षा है, वे उतना त्याग नहीं कर सकते । ताज्जुब तो यह है कि राष्ट्रीय संस्थाओंसे भी, जैसे कि गुजरातमें, स्वेच्छासे कातनेवाले पूरी संख्यामें नहीं मिल रहे हैं। जो कार्यकर्ता खादी- सेवामें हैं वे भी इस यज्ञार्थ कताईका, जिससे उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता, कष्ट नहीं करना चाहते। तब अगर खादी राष्ट्रकी जरूरतके मुताबिक उन्नति नहीं कर रही है तो उसमें भला आश्चर्य ही क्या है। खादी-कार्यकर्त्ता और खादी-प्रेमी सज्जन इस बातको जान लें । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, १४-६-१९२८ ४८२. पत्र : रामदेवको सत्याग्रह आश्रम साबरमती प्रिय रामदेवजी, १५ जून, १९२८ मैं बा को देहरादून जानेके लिए मना सकूंगा इस आशामें मैं आपके पत्रके उत्तरमें देरी करता रहा। परन्तु वे राजी नहीं हुईं। ऐसा लगता है कि उनके आसपास क्या हो रहा है, इसमें उनकी कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है। मुझे आशंका है कि अभी हालमें आश्रममें जो महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गये हैं, उनका भी उनके दिमाग १. यहाँ नहीं दी जा रही है। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४६६
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