चि० वसुमती, ४८४. पत्र : वसुमती पण्डितको शुक्रवार [१५ जून, १९२८] तुम्हारा पत्र मिला । मैंने गुरुकुलकी स्थिति के बारेमें पण्डित अभयजीको खत लिखा है । मुझे लगता है कि वहाँ किसी पुरुषके रहने पर ही यह सुधार हो सकते हैं । यहाँ चोरी हो गई थी। चोरोंने सुरेन्द्रको मारा और थोड़ी-सी मार शंकरभाईको भी पड़ी। भण्डारसे २०० रुपये चोरी गये। आश्रममें कई सुधार हो रहे हैं। अधिक लिखनेका समय नहीं है। सुरेन्द्रकी तबीयत अच्छी है । महादेव कुएँ परसे गिर पड़ा था । काफी चोट लगी है । गुजराती (सी० डब्ल्यू ० ४७८) की फोटो नकलसे । सौजन्य : वसुमती पण्डित ४८५. पत्र : एस० रामनाथन्को बापूके आशीर्वाद सत्याग्रह आश्रम साबरमती १६ जून, १९२८ प्रिय रामनाथन्, मुझे आपका हृदय स्पर्शी पत्र मिला। मैं आपसे जितना स्नेह करता हूँ यदि उससे भी ज्यादा स्नेह सम्भव है तो इस पत्रकी सचाईसे आप मेरे और भी प्रिय हो गये हैं । आपने जिन विचारोंको प्रकट किया है, मैं उनमें से कुछ एकके बारेमें सहमत नहीं हूँ । परन्तु इस वक्त यह सब प्रासंगिक नहीं है। महत्व इस बातका है कि आप जो कुछ कहते हैं उसपर आपका निश्चित विश्वास है । जहाँतक मेरा सम्बन्ध है, मैं यह जरूर महसूस करता हूँ कि हमें अब आपको अपनी बात मनवानेके लिए और प्रयत्न नहीं करना चाहिए, बल्कि आपको पूरी सद्भावना सहित अलग हो जाने देना चाहिए। परन्तु मैं आपका पत्र राजगोपालाचारीको मेज रहा हूँ । मुझे विश्वास है कि आप १. बाकी मुद्दरसे । २. देखिए " पत्र : च० राजगोपालाचारीको ", १७६-१९२८ । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४६८
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