पत्र : जी० रामचन्द्रन्को ४३७ इस बातको बुरा नहीं मानेंगे। मैं इस मामले पर राजगोपालाचारीसे विचार-विमर्श भी कर रहा हूँ । अंग्रेजी (एस० एन० १३६२०) की माइक्रोफिल्मसे । ४८६. पत्र : जी० रामचन्द्रन्को हृदयसे आपका, सत्याग्रह आश्रम साबरमती १६ जून, १९२८ प्रिय रामचन्द्रन्, तिरुपुरसे आपका पत्र पाकर मुझे प्रसन्नता हुई । हाँ, आपको हर चीजका यानी कि छोटेसे-छोटे ब्यौरेका भी पूर्ण ज्ञान अवश्य होना चाहिए। क्योंकि खादी-शिक्षणका अर्थ ही यह है कि छोटेसे छोटे रेशेका भी ध्यान रखा जाये । चाहे कताई हो या बुनाई या पूनियाँ बनानेका काम हो, हमारे कामका आरम्भ रेशेसे ही होता है । यही बात खादीसे सम्बन्धित हिसाब-किताबके बारेमें भी है। आप मुझे पत्र नियमित रूपसे अवश्य भेजिए, और इसलिए मैं चाहूँगा कि आप मुझे बता दें कि आप मुझे कितनी बार पत्र लिखेंगे हफ्ते में एक बार या पखवाड़े में एक बार, जिससे कि मुझे पता चल जाये कि दक्षिण आफ्रिकाकी डाककी तरह आपका पत्र किसी विशेष दिन आना ही है । आप आश्रमका संविधान' ध्यानसे अवश्य पढ़िये और अपने सुझाव भेज दीजिए । जैसा कि आप जानते हैं संविधान 'यंग इंडिया के इस सप्ताह के अंकमें छप रहा है । महादेवको आश्रमके कुएँसे पानी लाते हुए भारी चोट लग गई। उसका पैर फिसल गया और वह पीठके बल गिर गया। अब वह पहलेसे बेहतर है । आश्रम में बहुतसे महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं जिनमेंसे एक यह है कि अब आश्रममें मजदूरी करनेवाले मजदूर नहीं हैं। गोशाला, खेत और इस तरहकी हर चीजकी देखभाल आश्रमवासियोंको ही करनी होती है। संयुक्त रसोईघरकी संख्या बढ़कर ९४ हो गई है। हमारे यहाँ दो बार चोरीकी गम्भीर घटनाएँ हुईं । एकमें ५० चोरोंने चर्मालयको घेर लिया और कुछ पानेकी आशामें प्रत्येक पुरुष आश्रमवासीको १. देखिए, “ सत्याग्रह आश्रम ”, १४-६-१९२८ । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४६९
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