टिप्पणियाँ ४३९ यह आशा तो नहीं है, इसलिए उक्त समाचारपत्रोंके प्रति न लिखकर उन कुटुम्बोंके प्रति लिख रहा हूँ, जिनकी झूठी निन्दा करके ये अखबार लूटनेका धन्धा करते हैं । अंग्रेजीमें कहावत है कि, 'जहाँ भोले आदमी रहते हैं, वहाँ लुच्चोंकी बन आती है।' यह कहावत अनुभव के आधार पर बनी है। लाख निन्दा करने पर भी जो घबराते नहीं, अन्तमें थककर निन्दक उनकी निन्दा करना बन्द कर देता है । हममें झूठी शर्म, झूठी लोक लज्जाने गहरा घर कर लिया है। इसलिए जो चाहे वही हमें डरा और लूट सकता है। अगर कोई हमारी झूठी निन्दा करता है या हम पर झूठा इल्जाम लगाता है तो हम इस तरह डर जाते हैं कि मानो सचमुच ही हम उस निन्दा और इल्जामके पात्र हों। जब कि योग्य व्यवहार तो यह है कि चाहे जितनी टीका होती रहे, मगर जबतक वह सच्ची न हो, हम बिलकुल न दवें और ऐसी टीकाकी फिक्र न करें । सत्यादि व्रतोंके बारेमें आश्रम नियमावलीमें जिन नियमोंका पालन आवश्यक माना गया है, उनके बारेमें एक आश्रमवासीने कुछ सहायक सूत्र सुझाये हैं । वे रहस्यवाले और उन व्रतोंके पालनमें मदद देनेवाले हैं। इसलिए उनका सार नीचे देता हूँ । प्रत्येक व्रतके अन्त में हिन्दू शास्त्रमेंसे आधार दिये गये हैं। ये आधार नियमावलीमें- से जानबूझकर छोड़ दिये गये हैं। क्योंकि आश्रमकी मान्यता है कि ये व्रत केवल हिन्दूधर्मके इजारे नहीं हैं बल्कि सब धर्मो में समान हैं । किन्तु जो आधार यहाँ दिये गये हैं वे सुन्दर हैं, और इसलिए उन्हें पाठकोंकी जानकारीके लिए देता हूँ । सत्य 'मितभाषण सत्यका कवच है और इसलिए सत्यमें ही उसका समावेश होता है ।' सत्यमेव जयते नानृतम् । सत्यकी ही जय होती है, असत्यकी नहीं । अहिंसा f अहिंसा सभी धर्मोकी मर्यादा है।' न पापे प्रति पापः स्यात् । पापका जवाब पापसे नहीं हो सकता । ब्रह्मचर्य व्रत 'सभी इन्द्रियोंका सम्पूर्ण संयम इस व्रतमें गृहीत है ।' यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति । परमात्माको पानेकी इच्छा करनेवाले ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं । अस्तेय तैर्दत्तानप्रदायैम्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः । जो ईश्वरका दिया ईश्वरको अर्पण किये बिना भोगता है, वह चोर है । अपरिग्रह तेन त्यक्तेन भुंजीथाः । परिग्रहका त्याग करके विचरण करना । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७१
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