४४० अभय व्रत सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय भीति और नीति परस्पर विरोधी कल्पनाएँ हैं ।' अभयवृत्ति दैवी सम्पत्तिका आधार है। अभयं सर्वभूतेभ्यः । जो सबको अभय-दान देगा, वही निर्भय बन सकता है । अस्वाद । आहारका स्वादपूर्वक सेवन करना अहिंसा है।' आहार शुद्धी सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्ध ध्रुवा स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थानां विप्रमोक्षः । आहार शुद्धिसे अन्तःकरण शुद्ध होता है और अंतःकरण शुद्ध होनेसे आत्मस्मरण दृढ़ होता है तथा स्मरण- प्राप्ति से सभी बन्धनोंका या ग्रन्थियोंका नाश होता है । स्वदेशी 'अहिंसा जिस प्रकार धर्मकी मर्यादा है, उसी प्रकार स्वदेशी व्यवहारकी मर्यादा ।' स्वधर्मे निधनं श्रेयः । स्वधर्म में मृत्यु भी श्रेयस्कर है। शारीरिक श्रम शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् । केवल शारीरिक काम निष्काम भावसे करनेसे पाप नहीं होता है । अस्पृश्यता निवारण नमः पूर्वजाय च अपरजाय च । ऊँच-नीच सबको नमस्कार । सहिष्णुता सहनं सर्वधर्माणां तितिक्षा सा शुभा मता । सभी धर्मोको सहन करनेमें ही तितिक्षा है । [ गुजरातीसे ] नवजीवन, १७-६-१९२८ ४८९. गवर्नर और बारडोली माननीय गवर्नर साहबका श्री मुन्शीसे जो पत्र-व्यवहार हुआ है उससे वर्तमान राज्यतन्त्रका यथार्थ चित्र प्राप्त होता है। एक तरफ सरकार, श्री मुन्शी लोकमतकी तरफ न ढल जायें, इस हेतुसे उन्हें प्रसन्न करनेके लिए लम्बे-लम्बे तर्कोंसे भरे पत्र लिखती है और दूसरी ओर ऐसे असत्यको, जो कागजोंमें सिद्ध हो सके, चित्रित करती है और लोगोंको झूठा सिद्ध करनेका प्रयत्न करती है। वह अभी तक उन बातोंका खण्डन करती है जिन्हें जनताने अनेक बार स्पष्ट रूपसे प्रमाणित कर दिया है। मानो असत्य बार-बार कहनेसे सत्य बन जाता हो । इस समूचे पत्र में एक बात ही निथर कर स्पष्ट होती है। सरकार अपनी लगान-सम्बन्धी नीति बदलनेके लिए तैयार नहीं है । यदि उसकी लगान सम्बन्धी नीति Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७२
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