४४२ सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय सरकारी पत्रमें और प्रचार विभागकी विज्ञप्तियोंमें जो गन्ध आती है, हमें उसको परख लेनेकी जरूरत है। माननीय गवर्नरने अपने पत्रमें बारडोलीसे पठानोंको हटानेका कारण लोकमतका सम्मान बताया है, किन्तु सरकारी प्रचार विभाग कहता है कि अब बरसात का मौसम शुरू होनेसे पठानोंकी जरूरत कदाचित ही रहेगी। दो तरहके कारण बतानेके पीछे बात क्या है, यह गवर्नर साहब ही जानें। किन्तु हम तो प्रचार विभागके कारणका भेद ही समझ लें। बरसात के मौसम में जब्तियाँ आदि करनेके बजाय अर्थात् खुली दमन-नीतिका प्रयोग करनेके बजाय सरकार साम-नीतिका प्रयोग करेगी, ऐसी सम्भावना और शंका है। सम्भव है कि वह लोगोंको बुलाकर, गुप्त रूपसे गुप्तचर भेजकर, प्रलोभन देकर और धमकियाँ देकर उन्हें फोड़नेका उपाय करे। मैं आशा करता हूँ कि लोग इस छल प्रपंचसे चेत जायेंगे । [ गुजरातीसे ] नवजीवन १७-६-१९२८ ४९०. शिक्षा विषयक प्रश्न 1 ३ प्रश्न : जैसे कि हरएक विद्यार्थीके लिए तीन-चार भाषाओंका ज्ञान आवश्यक गिना जाता है, उसी प्रकार क्या प्रचलित धर्मोके सिद्धान्तों, विधियों, आग्रहों और वहमोंका भी ज्ञान देना आवश्यक नहीं है ? उत्तर : अगर हरएक धर्मके प्रति, जो धर्म है, अधर्म नहीं, हम विद्यार्थियोंके मनमें आदर, उदारता और प्रेम उत्पन्न कराना चाहते हैं तो उसके सिद्धान्तोंका ज्ञान अवश्य देना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि उनमें प्रचलित अंधविश्वासों और कर्मकाण्डकी विधियोंको जाननेकी आवश्यकता है। हिन्दुस्तान जैसे देशमें तो अपनी आँखें और कान खुले रखकर चलनेवाला वह्नों और विधियोंको समझ ही सकता है। अगर हम गुण- ग्राही बनना चाहते हैं तो हरएक धर्मकी विधियों और वह्नोंको जाननेका आग्रह ही न रखें। अपने ही धर्म में अगर कोई वहम और विधियां हों तो उन्हें सूक्ष्मतासे जानकर उनमें जो सुधार आवश्यक हों, उन्हें करनेका आग्रह विद्यार्थियोंसे करें। सम्भव है उनका उसीमें पूरा समय लग जाये । प्रश्न: आप वर्ण-व्यवस्था मानते हैं तो आप यह भी स्वीकार करते हैं या कि भिन्न-भिन्न वर्णोंकी शिक्षा भिन्न-भिन्न होनी चाहिए ? उत्तर : मुझे ऐसा नहीं लगता है कि हरएक वर्णके लिए अलग शिक्षा होनी चाहिए। सभी वर्णों में काफी समानता है, और हमारी शिक्षा सामान्य होनी चाहिए और अभी है ही । शिक्षाका एक उद्देश्य है, विद्यार्थीको मनुष्य बनाना और जो मनुष्य बनेगा वह मनुष्य पर लागू और उसके लिए शोभायमान नियम सहज ही जान लेगा । वर्णकी मेरी कल्पनामें तो यह है कि उसके धन्वे पर आधारित होनेके कारण, और चारों Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७४
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