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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७५

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शिक्षा विषयक प्रश्न - ३ ४४३ वर्णोंको अपने-अपने धन्धेके जरिए ही आजीविका पैदा करनी है इसलिए, वर्णोंकी विशेषता तो वंश-परम्परामें उतरनी चाहिए। किन्तु वर्ण-धर्मका यह अर्थ मैं कभी नहीं करता कि एकमें दूसरे तीन वर्णोंके गुण कभी होंगे ही नहीं। शूद्रके समान परिचर्या करके ब्राह्मण पेट न मरे, किन्तु उसे अगर परिचर्या करनी ही न आये या करनेमें उसे शर्म आये तो वह ब्राह्मण ही नहीं है । निःस्वार्थ सेवाके बिना शुद्ध ज्ञान सम्भव ही नहीं है । और चाहे शूद्र वेदादि पढ़कर भिक्षापात्रमें मिले अन्न पर उदर- निर्वाह न करे, मगर तो भी सुव्यवस्थित समाज में तो उसे वेदादिका ज्ञान पाना ही होगा । प्रश्न: क्या यह बात सच है, जैसा कि आप कहते हैं कि उद्योगकी शिक्षामें ही सारी शिक्षा आ जाती है और बौद्धिक शिक्षा तो केवल शिक्षाकी श्रृंगार-मर है । अगर यह सच हैं तो आप महाविद्यालयकी शिक्षाको किस लिए पसन्द करते हैं ? उत्तर : यह बात जितनी सच है, उतनी ही झूठ भी है । जहाँ बौद्धिक शिक्षाकी मूर्तिपूजा की जाती है, वहाँ मैं जरूर कहूँगा कि उद्योगकी शिक्षामें सभी कुछ आ जाता है । शिक्षाकी मेरी व्याख्यामें बुद्धि और उद्योगके बीच ईंट-पत्थर की कोई दीवार नहीं है; यानी मेरे लेखें दोनों बिलकुल भिन्न वस्तुएँ नहीं हैं। उद्योगकी शिक्षामें बुद्धिकी शिक्षा यानी बुद्धिका विकास छिपा ही हुआ है । मैं तो यह भी कहनेकी घृष्टता करूंगा कि उद्योगकी शिक्षाके बिना बुद्धिका सच्चा विकास सम्भव ही नहीं है। दीवार चिननेवाले राजको केवल आजीविका पैदा कर लेने लायक जो ज्ञान होता है, मेरी दृष्टिमें वह शिक्षा नहीं है। समाज में इस उद्योगका क्या स्थान है, ईंट क्या है, घरकी क्या आवश्यकता है, घर कैसे होने चाहिए, घरका सभ्यताके साथ कैसा निकट सम्बन्ध है, इत्यादि सभी विषय राजकी शिक्षाके अन्तर्गत आ जाते हैं। कितनी ही बार हम बौद्धिक शिक्षाका यह गलत अर्थ मान लिया करते हैं कि वह समाचारों और तथ्योंके सामान्य ज्ञानका नाम है । ऐसा सामान्य ज्ञान न पाने पर भी बुद्धिका सम्पूर्ण विकास होना सम्भव है । जो शिक्षक विद्यार्थियोंके दिमागको अनगिनत तथ्योंसे भर देनेकी संदूकची बना डालता है, उसने स्वयं शिक्षाका पहला पाठ भी नहीं सीखा है । अब समझ में आ गया होगा कि प्रश्नमें पूछी हुई बात किस तरह जितनी सच है, उतनी ही झूठ भी है । उद्योगकी और बौद्धिक शिक्षाकी मेरी कल्पना स्वीकार करें तो यह बात गलत है। इन दोनों शिक्षाओंको अलग रख कर, इनके बारेमें जो भ्रम रहा है, उस भ्रमपूर्ण शिक्षाको ध्यान में रखकर प्रश्न पूछा गया हो तो बात सच है । और अब यह समझ में आ गया होगा कि मैं महाविद्यालयकी शिक्षाको क्यों और किस शर्त पर पसन्द करता हूँ। मेरी कल्पनाके महाविद्यालयमें राज, बढ़ई, बुनकर सच्चे बुद्धिमान समाजसेवक होंगे; वे महज आजीविका पैदा करने लायक ज्ञान पाये हुए राज, बढ़ई या बुनकर नहीं होंगे। महाविद्यालयके बुनकरोंमें से मैं कबीरकी, मोचियों में से भोजा भगतकी, सुनारोंमें से अखाकी, किसानोंमें से गुरु गोविन्दकी आशा रखता हूँ । इन चारोंको मैं बौद्धिक शिक्षा पाया हुआ गिनता हूँ । Gandhi Heritage Portal