सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय प्रश्न : औद्योगिक शिक्षा ही अगर शिक्षाका सर्वस्व हो तो बढ़ई, लुहार, बुन- करकी समितिको आप विद्यापीठ क्यों नहीं सौंप देते ? पीछे वे भले ही बौद्धिक शिक्षाके अध्यापकोंको नौकरके रूपमें रखें । उत्तर : इस प्रश्नका जवाब इससे पहले प्रश्नके उत्तरमें आ गया है, तो भी अपना अर्थ और अधिक स्पष्ट करनेके लिए मैं जवाब दे रहा हूँ। अगर मेरे पास कबीर जैसे जुलाहे हों तो मैं अवश्य विद्यापीठकी लगाम उनके हाथों सौंप दूं और उनके नीचे बौद्धिक शिक्षाके अध्यापक " नौकरके रूपमें काम करनेमें लज्जा नहीं किन्तु मान समझेंगे। हमने उद्योगोंको शिक्षाका विषय नहीं माना और इसीसे आज उद्योग करने- वालेका स्थान हलका गिना गया है, और उद्योग करनेवालोंकी मदद समाज-सेवाके लिए जरूरी प्रमाण में अथवा किसी प्रमाण में नहीं मिल रही है। [ गुजरातीसे ] नवजीवन, १७-६-१९२८ ४९१. पत्र : रामानन्द चटर्जीको १७ जून, १९२८ प्रिय रामानन्द बाबू, रजिस्टरी की हुई पुस्तके' सहित आपके पत्रकी प्राप्ति की स्वीकृति न देनेका एकमात्र बहाना यह है कि कामकी वजहसे मेरी नाक में दम आ गया है और मेरा बहुत-सा पत्र-व्यवहार निबटानेको बकाया है। महादेव देसाई, जो पत्र-व्यवहारका कुछ हिस्सा निबटाने में आम तौर पर मेरा साथ देते हैं, बारडोली और अहमदाबादके वीच आते-जाते रहते हैं और इसलिए इसपर नजर तक नहीं डाल सकते । कामकी भरमारके सिवा और भी कई कारण हैं। जिनसे मैं ऐसा पिछड़ गया हूँ । इस आशामें कि पहला मौका मिलते ही इसे पढ़ सकूंगा, मैं पाण्डुलिपिको अपने सामने रखे हुए हूँ । परन्तु वह मौका कब आयेगा, यह मैं नहीं कह सकता । श्रीयुत रामानन्द चटर्जी हृदयसे आपका, प्रवासी प्रेस ९१, अपर सर्कुलर रोड कलकत्ता अंग्रेजी (एस० एन० १३४१९ ) की फोटो - नकलसे । १. डा० जे० टी० संडरलैंड कृत इंडिया इन घांडेज हर राइट टु फ्रीडमको पाण्डुलिपि गांधीजीको मत प्रकट करनेके लिए भेजी गई थी। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७६
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