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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७७

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४९२. पत्र: सुरेन्द्रनाथ विश्वासको

सत्याग्रह आश्रम
साबरमती
१७ जून, १९२८

प्रिय मित्र,

आपका पत्र[] मिला। आपके साथ मेरी सहानुभूति तो है परन्तु मेरी बुद्धि आपकी बातका समर्थन नहीं कर सकती। जैसा कि आप जानते हैं मैं इस चीजके हमेशा खिलाफ रहा हूँ कि कार्यकर्त्ता आमदनी से ज्यादा खर्च करके कर्जदार हो जायें और परेशानी में पड़ें। मैं इसे एक भयंकर आदत मानता हूँ। मैं आपकी मदद किस तरह कर सकता हूँ? या यह कहना और भी बेहतर होगा कि मैं आपकी इतनी ही सहायता कर सकता हूँ, कि आपको दिवालिया करार देनेवाली कचहरी में चले जानेकी सलाह दूँ या कहूँ कि आप अपने ऋणदाताओंके पास जाकर अपना सब कुछ उनके हवाले कर दें और फिर बिलकुल एक मजदूर का-सा जीवन बितायें। यदि हमें ईमानदारीसे भारतकी सेवा करनी है, तो हम पढ़े-लिखे लोगोंके लिए मुझे और कोई रास्ता दिखाई नहीं देता।

हृदयसे आपका,

श्रीयुत सुरेन्द्रनाथ विश्वास

पी १४ ए, न्यू पार्क स्ट्रीट

कलकत्ता

अंग्रेजी प्रति (एस॰ एन॰ १३४२१) की फोटो-नकल से।

 
  1. सुरेन्द्रनाथ विश्वासने लिखा था कि मैं जब १९२५ में फरीदपुर में हुए बंगाल प्रान्तीय सम्मेलनकी स्वागत समितिका प्रधान था, उस वक्त मुझपर कुछ कर्ज हो गया था। कुछ कर्जे मुझपर निजी तौरपर भी हो गया था। मेरे खिलाफ कई मुकदमे चल रहे हैं और कुछ वक्त मैं हिरासत में भी रह चुका हूँ। गांधीजीसे अपील करते हुए उन्होंने लिखा था: क्या मैं आपसे परिचय-पत्र प्राप्त करनेकी प्रार्थना कर सकता हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप केवल यह लिख दें कि आप सम्मेलनमें उपस्थित थे और आपने यह सुना था कि खर्च पूरा करनेके लिए स्वागत-समितिने कुछ कर्ज लिया था और यह कि मैं स्वागत समितिका प्रधान था तथा आपका परिचित हूँ। यह भी लिख दें कि प्रधानकी हैसियत से मेरे कर्जकी अदायगी करनेके लिए मुझे कृपालु जनताकी मदद चाहिए।