सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४७९

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको ४४७ परन्तु आपके अन्तिम वाक्यने तो मुझे आश्चर्यमें ही डाल दिया । आप कहते हैं कि आप कोई जिम्मेदारी नहीं लेंगे; जब कि कर्ज लेनेके वक्त जिन शर्तोंके अधीन कर्ज दिया गया था उनको अच्छी तरह जानते हुए आपने जिम्मेदारी ली थी । आप यह क्यों चाहते हैं कि अ० भा० च० संघका एक एजेंट आपकी सहायताके लिए रहे ? मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि यह कर्ज निश्चित रूपसे कानूनी कर्ज तो है ही, किन्तु वह एक नैतिक कर्ज भी है और आपको सौजन्यतापूर्वक इसकी अदायगी कर देनी चाहिए।" हृदयसे आपका, मो० क० गांधी श्रीयुत एन० सी० बारदोलाई शान्ति भवन गोहाटी (असम) अंग्रेजी (एस० एन० १३६२३) की माइक्रोफिल्मसे । प्रिय सतीश बाबू, ४९५. पत्र : सतीशचन्द्र दासगुप्तको सत्याग्रह आश्रम साबरमती १७ जून, १९२८ आपका पत्र मिला । मैं निखिलके बारेमें चिन्ता नहीं कर रहा हूँ । स्वयं तो मैं समझ गया हूँ कि उसकी मृत्यु आसन्न है और मैंने अपनेको इसके लिए तैयार कर लिया है। मुझे तो इस बातकी चिन्ता है कि इससे हेमप्रभादेवीको कितना आघात पहुँचेगा । यद्यपि वह मुझे बहादुरीसे लिखती रही हैं, मुझे मालूम है कि वास्तविक घटनासे उनपर क्या गुजरेगी और आप पर भी क्या बीतेगी। परन्तु मगनलालकी मृत्युकी दुःखकी आँचमें से गुजरकर परिशुद्ध होनेके बाद मुझे आपको यह कहनेका साहस है कि आप अपने हृदयको कड़ा कर लें और शोकातुर न होने दें। जो देता है, उसे वापस ले लेनेका अधिकार भी अवश्य होना चाहिए। और फिर वापस ले लेने जैसी बात वस्तुतः तो कुछ है नहीं । " मृत्यु केवल निद्रा और विस्मरण है । । मगनलाल अपनी जीवितावस्थाकी अपेक्षा अब और अधिक जीवित है । आश्रममें इन दिनों मगनलालके साथी कार्यकर्त्ता उन सारे परिवर्तनोंको जिन्हें मगनलाल स्वयं करना चाहते परन्तु सम्भवतः कार्यान्वित नहीं कर सकते थे बड़े उत्साहसे और स्वेच्छापूर्वक कर रहे हैं। १. पत्रकी एक प्रति सचिव, अ० भा० च० संघको भेजी गई थी। 33 Gandhi Heritage Portal