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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८३

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४९९. पत्र : वसुमती पण्डितको आश्रम चि० वसुमती, साबरमती १७ जून, १९२८ तुम सहस्रधारा देख पाई, यह तो बहुत अच्छा हुआ । शब्द 'सहस्त्र' नहीं सहस्र' है। भैंसके दूध और घीका त्याग सिर्फ आश्रम में ही किया जायेगा। यदि आश्रमके बाहर जायें तो वहाँ यह नियम लागू नहीं होगा। हालाँकि जिसने गाय और भैंसका भेद अच्छी तरह समझ लिया हो वह चाहे जहाँ हो, उसका त्याग कर सकता है । इस समय आश्रम में गायका दूध काफी मिल रहा है। एक जगहसे गायका घी मिलनेका भी बन्दोबस्त हो गया है । यह पत्र सुबह चार बजेसे पहले लिखवाया था । दिनमें तुम्हारा दूसरा पत्र भी मिला । कमलाको माफी वाला भाग पढ़वा दिया था । काम निपट नहीं पाता था, इसलिए आजकल सुबह तीन बजे उठ जाता हूँ । चि० कुसुम भी उसी समय उठनेका हठ करती है, इसका मैं विरोध नहीं करता । गुजराती (सी० डब्ल्यू० ४८०) की फोटो - नकलसे । सौजन्य : वसुमती पण्डित भाईश्री विट्ठलभाई, ५००. पत्र : विट्ठलभाई पटेलको बापूके आशीर्वाद १७ जून, १९२८ वल्लभभाई, स्वामी और जमनालालजी आ गये हैं । मसविदा इस पत्रके साथ मेज रहा हूँ । मुझे लगता है कि इससे ज्यादा ब्यौरेमें जानेकी कोई जरूरत नहीं है । इस समय तो वह जो चाहे सो कर लें । यदि सत्याग्रही सच्चे हैं तो जीतेंगे ही। यदि अन्तमें वे निर्बल पड़ जायें तो जब जागेंगे, हम तभी सुबह समझेंगे । निर्बल मित्र भी दुश्मनकी तरह स्वार्थी होते हैं, इस समय तो यह कहावत सिद्ध हो रही है । आपके कामसे तो इस समय सभी बहुत खुश हो रहे हैं। खूब जियें और खूब काम करें। मोहनदासके वन्देमातरम् गुजराती (एस० एन० १४४४५ ) की माइक्रोफिल्मसे । Gandhi Heritage Portal