सुज्ञ भाईश्री, ५०१. पत्र : प्रभाशंकर पट्टणीको १८ जून, १९२८ आपके कुशल-क्षेमसे पहुँचनेकी खबर मैंने पढ़ ली थी। यह तो भिक्षा पत्र है । मेरे पास कितने ही दुर्बल ढोर, सूखी हुई गायें और बछड़े हुई गायें और बछड़े हैं। इन सबको आश्रम में पालना खर्चीला काम है। यदि आप उन्हें अपनी जमीनमें रख लें तो खर्च कम हो जाये। आप कहें तो खर्च मेज दूंगा । यदि ऐसा लगे कि यह काम हो सकता है तो भाई जोशीको यहाँ भेज दें। वह वहाँ हैं इसीसे मुझे यह बात सूझी है। वह आकर देख जायें और आपको पूरा हाल बता दें, तथा यदि आपको ठीक लगे तो आश्रमके ढोरोंको आप आश्रय दें। यह प्रयोग गोरक्षा मण्डलके लिए कर रहा हूँ । क्या लेडी रमाबाईको चरखेकी बात याद है ? मोहनदासके वन्देमातरम् गुजराती (जी० एन० ५९०८) की फोटो नकलसे तथा सी० डब्ल्यू० ३२२२ से । सौजन्य : महेश पट्टणी ५०२. पत्र : घनश्यामदास बिड़लाको भाई घनश्यामदासजी, आश्रम १८ जून, १९२८ इस पत्रके साथ दो पत्र आस्ट्रीयाके मित्रोंका भेजता हूँ। दोनों बहोत अच्छे हैं। उनका हिंदुस्थानमें बुलाना और हिंदुस्थानका परिचय दिलाना आवश्यक समझता हूं। ऐसी बातों में आपके दानका उपयोग मैं नहि करना चाहता हूं। ऐसे कार्यमें माई जुगलकिशोरजी रस लेते हैं। यदि आप उचित समझें तो उनको सब पत्र भेज दें । उनके लिये २०० पाउंड भेजना चाहिये । यदि वे इस दान देना चाहते हैं तो शीघ्रतासे पैसे भेजने होंगे । आपका स्वास्थ्य अच्छा होगा । आश्रम नियमावली व्यानसे पढ़ें और कुछ सूचना देना उचित समझें तो अवश्य भेजें । आपका, मोहनदास सी० डब्ल्यू ० ६१६० से । सौजन्य : घनश्यामदास बिड़ला १. श्री और श्रीमती स्टेंडेनथ । २. देखिए "सत्याग्रह आश्रम ", १४-६-१९२८ । Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८४
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