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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८५

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५०३. पत्र : मणिलाल गांधी और सुशीला गांधीको आश्रम चि० मणिलाल और सुशीला, साबरमती १९ जून, १९२८ तुम्हारे पत्र तो मिलते रहते हैं, किन्तु यह नहीं कह सकता कि उनसे सन्तोष होता है। तुम दोनों हमेशा जल्दी में रहते हो। तुम्हें इतना ज्यादा काम रहता है, मैं इसकी कल्पना नहीं कर पाता । किन्तु 'मामा नहीं है, इससे किसीको भी मामा कह लें, ' वाली कहावतका विचार करके हम दोनों सन्तोष कर लेते हैं। सुशीलासे मैंने कुछ ज्यादा आशा की थी। सोचता था उसमें मणिलालका-सा शरीरबल नहीं आया तो भी अक्ल तो आ ही गई होगी, किन्तु तुम दोनों एक दूसरेसे दोष ही ग्रहण करते हो, गुण क्यों ग्रहण नहीं करते ? यह जबर्दस्त आलस्य त्याग दो तो मुझे अच्छा लगेगा और तुम्हारा भी भला होगा । अफ्रिकासे जो दूसरे पत्र आते हैं उनमें हमेशा तुम्हारे पत्रोंसे ज्यादा समाचार रहते हैं । पिछले पत्रोंमें मैंने तुम्हें याद दिलाया था कि तुम्हें आश्रमके पैसे देने हैं। इसका उत्तर मुझे मिलना ही चाहिए। यह ऋण बट्टे खाते डाल दिया जाये, यदि तुम यह बात सहना चाहो तो सुखसे सहन करो किन्तु मुझसे तो यह नहीं सहा जायेगा । आश्रममें आजकल महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे हैं। उनका विवरण देनेका फिलहाल समय नहीं है । आजकल बहुतसे पत्र सुबह चार बजे ही प्रार्थनासे पूर्व उठकर लिखाता हूँ, तभी कुछ निपट पाता है । इतना लिखवाते- लिखवाते चार बजेका घंटा बज गया है, इसलिए समाप्त करता हूँ । गुजराती (जी० एन० ४७३९ ) की फोटो नकल से । बापूके आशीर्वाद Gandhi Heritage Portal