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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 36.pdf/४८६

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५०४. पत्र : प्यारेलाल नैयरको आश्रम प्रिय प्यारेलाल, साबरमती १९ जून, १९२८ मैं यह पत्र बोलकर लिखवा रहा हूँ, क्योंकि मैं कात रहा हूँ और गुजरातीमें पत्र लिखनेमें जो कुछ मिनट लग सकते हैं, उन्हें बचा लेना चाहता हूँ । मैं तुम्हें एकदम यह लिखकर बतानेके लिए आतुर हूँ कि तुम्हारा लेख अत्युत्तम है । चाहे जल्दी में ही सही, मैंने इसे पूरा पढ़ा है। इसमें मुझे कोई भी खटकनेवाली बात नहीं मिली; यह ठीक वैसी चीज है जो बाहरके लोगोंके लिए सरकारी अर्थ में नहीं परन्तु हमारे अपने अर्थमें जरूरी थी। मुझे यकीन है कि यह लेख और कोई नहीं लिख सकता था, क्योंकि किसी दूसरेमें तुम्हारे जैसी कुशाग्रता नहीं है । तुमने दिखाया है कि संघर्ष सम्भव कैसे हुआ और यह शानदार संगठन अस्तित्वमें कैसे आया । मैं यही आशा करता हूँ कि भारतीय अखबार देशमें सभी जगह इस लेखको उद्धृत करेंगे। इस लेखसे पता चलता है कि तुममें जबर्दस्त क्षमता है; किन्तु तुम्हारे मनमें आत्मविश्वास होना चाहिए। मुझे तो 'यंग इंडिया' में तुम्हारा निबन्ध पढ़नेके बाद इसमें कोई सन्देह ही नहीं रहा । महादेव और तुम्हारे हाथमें सौंपकर मैं 'यंग इंडिया' की ओरसे बिलकुल निश्चिन्त हो सकता हूँ। इसकी आशा और प्रतीक्षा तो मैं करूँगा ही । महादेव अब ठीक है । वह एक या दो दिनमें उठ खड़ा होगा और काम करने लगेगा । वह काम अब भी कर रहा है। तुम्हें सबब तो मालूम होगा। वह कुएँ परसे पानी भरते हुए गिर गया। आश्रममें हमारे पास मजदूर नहीं हैं। तुम जानते हो कि हमारे यहाँ एक बार डकैती हो चुकी है और एक बार सेंध लग चुकी है। डाकू ५० के लगभग थे । चर्मालयमें कार्यकर्त्ताओंके साथ सुरेन्द्र और शंकरभाईको खूब मार पड़ी। जो लोग पिटे उनमें ये दोनों थे, इससे मुझे बड़ी खुशी हुई। डकैतीके दो दिन बाद भण्डारमें सेंध लगाई गई। वैसे मैं इन दोनोंमें परस्पर सम्बन्ध नहीं मानता । चकित कर देनेवाले और भी बहुत-से परिवर्तन हुए हैं। संयुक्त रसोई घरमें खानेवालोंकी संख्या बढ़कर सी हो गई है। और जहाँ मैं रह रहा था वह जगह महिलाओंका आवास बना दी गई है । मेरा कार्यालय मगनलालके कमरेमें है। रसोई- घर छात्रालयसे संलग्न रसोईघरमें चला गया है। मैं वहीं बाकी लोगोंके साथ खाना खाता हूँ । यदि तुम्हें किसीसे कभी बात करनी ही हो तो दूसरी चीजोंके बारेमें इमाम साहबसे ही जान लेना । Gandhi Heritage Portal